श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 26: ऐल-गीत  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक
गुणमय्या जीवयोन्या विमुक्तो ज्ञाननिष्ठया ।
गुणेषु मायामात्रेषु द‍ृश्यमानेष्ववस्तुत: ।
वर्तमानोऽपि न पुमान् युज्यतेऽवस्तुभिर्गुणै: ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
गुण-मय्या—प्रकृति के गुणों पर आधारित; जीव-योन्या—भौतिक जीवन के कारण से, झूठी पहचान; विमुक्त:—पूर्णतया मुक्त व्यक्ति; ज्ञान—दिव्य ज्ञान में; निष्ठया—पूरी तरह स्थिर होने से; गुणेषु—गुणों के फलों में से; माया-मात्रेषु—जो केवल मोह है; दृश्यमानेषु—आँखों के सामने प्रकट; अवस्तुत:—यद्यपि सत्य नहीं है; वर्तमान:—रहते हुए; अपि—यद्यपि; न—नहीं; पुमान्— वह व्यक्ति; युज्यते—फँस जाता है; अवस्तुभि:—असत्य; गुणै:—गुणों की अभिव्यक्ति से ।.
 
अनुवाद
 
 दिव्य ज्ञान में स्थिर व्यक्ति प्रकृति के गुणों के फलों से अपनी झूठी पहचान त्याग कर, बद्ध जीवन से मुक्त हो जाता है। इन फलों को मात्र मोह समझ कर उन्हीं के बीच निरन्तर रहते हुए वह प्रकृति के गुणों में फँसने से अपने को बचाता है। चूँकि गुण तथा उनके फल सत्य नहीं होते, अतएव वह उन्हें स्वीकार नहीं करता।
 
तात्पर्य
 प्रकृति के तीनों गुण भौतिक शरीरों, स्थानों, परिवारों, देशों, भोजनों, खेलों, युद्ध, शान्ति आदि के रूप में प्रकट होते है। दूसरे शब्दों में, इस जगत में दिखने वाली हर वस्तु प्रकृति के गुणों से बनी है। मुक्तात्मा भौतिक शक्ति के सागर में रहते हुए भी, हर वस्तु को भगवान् की सम्पत्ति मानता है, जिससे वह उनमें फँसता नहीं। यद्यपि माया ऐसे मुक्तात्मा को भी चोर बनने के लिए लालच देती है— इन्द्रियतृप्ति के लिए भगवान् की सम्पत्ति की चोरी करने के लिए ललचाती है, किन्तु कृष्णभावनाभावित व्यक्ति माया के फेंके चारे को खाता नहीं। वह ईमानदार तथा कृष्णभावनामृत में शुद्ध बना रहता है। दूसरे शब्दों में, वह यह विश्वास नहीं करता कि ब्रह्माण्ड की कोई भी वस्तु, विशेष रूप से स्त्री का मोहमय रूप, उसकी इन्द्रियतृप्ति की निजी सम्पत्ति बन सकती है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥