श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 26: ऐल-गीत  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक
यथोपश्रयमाणस्य भगवन्तं विभावसुम् ।
शीतं भयं तमोऽप्येति साधून् संसेवतस्तथा ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
यथा—जिस तरह; उपश्रयमाणस्य—पास आने वाले का; भगवन्तम्—शक्तिमान; विभावसुम्—अग्नि; शीतम्—शीत; भयम्— डर; तम:—अंधकार; अप्येति—हट जाते हैं; साधून्—साधु भक्त; संसेवत:—सेवा में लगे रहने वाले के लिए; तथा—उसी प्रकार ।.
 
अनुवाद
 
 जो व्यक्ति यज्ञ-अग्नि के पास पहुँच चुका हो, उसके लिए जिस तरह शीत, भय तथा अंधकार दूर हो जाते हैं, उसी तरह जो व्यक्ति भगवान् के भक्तों की सेवा में लगा रहता है उसका आलस्य, भय तथा अज्ञान दूर हो जाता है।
 
तात्पर्य
 सकाम कर्मों में लगे रहने वाले लोग मन्द हैं; उन्हें भगवान् तथा आत्मा के विषय में उच्चतर जागरूकता का अभाव रहता है। भौतिकतावादी लोग मानो यंत्रवत् अपनी इन्द्रियों तथा इच्छाओं की तृप्ति में लगे रहते हैं, इसलिए उन्हें मन्द अथवा लगभग अचेत माना जाता है। जब वह भगवान् के चरणकमलों की सेवा करता है, तो ऐसा सारा आलस्य, भय तथा अज्ञान जाता रहता है, जिस तरह अग्नि के पास जाने पर शीत, भय तथा अँधेरा दूर हो जाता है।
 
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