श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 28: ज्ञान-योग  » 
 
 
 
 
संक्षेप विवरण:  पिछले अध्यायों में जिस ज्ञानयोग का विस्तार से वर्णन किया जा चुका है उसका सार-संक्षेप इस अध्याय में दिया गया है। इस ब्रह्माण्ड में प्रत्येक उत्पन्न वस्तु प्रकृति...
 
श्लोक 1:  भगवान् ने कहा : मनुष्य को चाहिए कि किसी अन्य व्यक्ति के बद्ध स्वभाव तथा कर्मों की न तो प्रशंसा करे, न ही आलोचना। प्रत्युत उसे इस जगत को प्रकृति तथा भोक्ता आत्माओं का संमेल ही मानना चाहिए क्योंकि वे सभी एक परम सत्य पर आश्रित हैं।
 
श्लोक 2:  जो भी व्यक्ति दूसरों के गुणों तथा आचरण की प्रशंसा करता है या आलोचना करता है, वह मायामय द्वैतों में फँसने के कारण अपने उत्तमोत्तम हित से शीघ्र विपथ हो जाएगा।
 
श्लोक 3:  जिस तरह देहधारी आत्मा की इन्द्रियाँ स्वप्न देखने के भ्रम या मृत्यु जैसी गहरी निद्रावस्था के द्वारा परास्त हो जाती हैं, उसी तरह भौतिक द्वन्द्व का अनुभव करने वाले व्यक्ति को मोह तथा मृत्यु का सामना करना पड़ता है।
 
श्लोक 4:  जो कुछ भौतिक शब्दों से व्यक्त किया जाता है या मन के द्वारा ध्यान किया जाता है, वह परम सत्य नहीं है। अतएव द्वैत के इस असार जगत में, वस्तुत: क्या अच्छा या क्या बुरा है और ऐसे अच्छे तथा बुरे की मात्रा को कैसे मापा जा सकता है?
 
श्लोक 5:  यद्यपि छायाएँ, प्रतिध्वनियाँ तथा मृगमरीचिकाएँ असली वस्तुओं के भ्रामक प्रतिबिम्ब ही होती हैं, किन्तु ये प्रतिबिम्ब अर्थपूर्ण या ज्ञेय भाव का सादृश्य उत्पन्न करते हैं। इसी तरह यद्यपि शरीर, मन तथा अहंकार के साथ बद्धजीव की पहचान भ्रामक है, किन्तु यह पहचान मृत्यु पर्यन्त उसके भीतर भय उत्पन्न करती रहती है।
 
श्लोक 6-7:  एकमात्र परमात्मा ही इस जगत के परम नियन्ता तथा स्रष्टा हैं, अत: अकेले वे भी उत्पन्न किये हुए हैं। इसी प्रकार जो समस्त जगत का आत्मास्वरूप है, वह पालन भी करता है और पालित भी होता है; हरता है और हरा भी जाता है। यद्यपि परमात्मा हर वस्तु से तथा अन्य हर किसी से पृथक् हैं, किन्तु कोई अन्य जीव उनसे पृथक् रूप में निश्चित नहीं किया जा सकता। तीन प्रकार की प्रकृति के जो उनके भीतर देखी जाती है, प्राकट्य का कोई वास्तविक आधार नहीं है। प्रत्युत तुम यह समझ लो कि तीन गुणों वाली यह प्रकृति उनकी मायाशक्ति का ही प्रतिफल है।
 
श्लोक 8:  जिसने मेरे द्वारा यहाँ पर वर्णित सैद्धान्तिक तथा अनुभूत ज्ञान में स्थिर होने की विधि को भलीभाँति समझ लिया है, वह भौतिक निन्दा या स्तुति में रत नहीं होता। वह इस जगत में सूर्य की तरह सर्वत्र स्वतंत्र होकर विचरण करता है।
 
श्लोक 9:  प्रत्यक्ष अनुभूति, तर्कसंगत निगमन, शास्त्रोक्त प्रमाण तथा आत्म अनुभूति द्वारा मनुष्य को यह जान लेना चाहिए कि इस जगत का आदि तथा अन्त है, अतएव यह परम सत्य नहीं है। इस तरह मनुष्य को निर्लिप्त होकर इस जगत में रहना चाहिए।
 
श्लोक 10:  श्री उद्धव ने कहा : हे भगवन्, इस भौतिक जगत के लिए यह सम्भव नहीं कि वह द्रष्टारूपी आत्मा का अनुभव हो या दृश्यरूपी शरीर का अनुभव हो। एक ओर जहाँ आत्मा स्वाभाविक तौर पर, पूर्ण ज्ञान से समन्वित होता है, वहीं दूसरी ओर भौतिक शरीर चेतन जीव नहीं है। तो फिर जगत का यह अनुभव किससे सम्बद्ध है?
 
श्लोक 11:  आत्मा अव्यय, दिव्य, शुद्ध, आत्म-प्रकाशित तथा किसी भौतिक वस्तु से कभी न ढका जाने वाला है। यह अग्नि के समान है। किन्तु अचेतन शरीर, काष्ठ की तरह मन्द है और अनभिज्ञ है। अतएव इस जगत में वह कौन है, जो वास्तव में भौतिक जीवन का अनुभव करता है?
 
श्लोक 12:  भगवान् ने कहा : जब तक मूर्ख आत्मा भौतिक शरीर, इन्द्रियों तथा प्राण के प्रति आकृष्ट रहता है, तब तक उसका भौतिक अस्तित्व विकसित होता रहता है यद्यपि अन्ततोगत्वा यह अर्थहीन होता है।
 
श्लोक 13:  वस्तुत: जीव भौतिक जगत से परे है। किन्तु भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व दिखाने की मनोवृत्ति के कारण, उसका भौतिक अस्तित्व मिटता नहीं और वह सभी प्रकार की हानियों से प्रभावित होता है, जिस तरह स्वप्न में घटित होता है।
 
श्लोक 14:  यद्यपि स्वप्न देखते समय मनुष्य को अनेक अवांछित वस्तुओं का अनुभव होता है, किन्तु जग जाने पर वह स्वप्न के अनुभवों से तनिक भी उद्विग्न नहीं होता।
 
श्लोक 15:  शोक, हर्ष, भय, क्रोध, लोभ, मोह, लालसा, जन्म तथा मृत्यु मिथ्या अहंकार के अनुभव हैं, शुद्ध आत्मा के नहीं।
 
श्लोक 16:  जो जीव अपनी पहचान गलती से अपने शरीर, इन्द्रियों, प्राण तथा मन से करता है और जो इन आवरणों के भीतर रहता है, वह अपने ही बद्ध भौतिक गुणों तथा कर्म का रूप धारण करता है। वह समग्र भौतिक भक्ति के सापेक्ष विविध उपाधियाँ ग्रहण करता है और इस तरह, परम काल के कठोर नियंत्रण में, संसार के भीतर इधर-उधर दौने के लिए बाध्य होता है।
 
श्लोक 17:  यद्यपि मिथ्या अहंकार का कोई यथार्थ आधार नहीं है, किन्तु यह अनेक रूपों में देखा जाता है—यथा मन, वाणी, प्राण तथा शरीर के कार्यों के रूप में। किन्तु प्रामाणिक गुरु की उपासना के द्वारा तेज की हुई दिव्य ज्ञानरूपी तलवार से, गम्भीर साधु इस मिथ्या पहचान को काट देता है और इस जगत में समस्त भौतिक आसक्ति से मुक्त होकर निवास करता है।
 
श्लोक 18:  असली आध्यात्मिक ज्ञान तो आत्मा और पदार्थ के विवेक पर आधारित है और इसका अनुशीलन शास्त्रों के प्रमाण, तपस्या, प्रत्यक्ष अनुभूति, पुराणों के ऐतिहासिक वृत्तान्तों के संग्रहण तथा तार्किक निष्कर्षों द्वारा किया जाता है। परब्रह्म जो अकेला इस ब्रह्माण्ड की सृष्टि के पूर्व विद्यमान था और जो इसके संहार के बाद भी बचा रहेगा, वही काल तथा परम कारण भी है। इस सृष्टि के मध्य में भी एकमात्र परब्रह्म वास्तविक सत्य है।
 
श्लोक 19:  जिस तरह सोने की वस्तुएँ तैयार होने के पूर्व, एकमात्र सोना रहता है और जब ये वस्तुएँ नष्ट हो जाती हैं, तो भी एकमात्र सोना बचा रहता है और जब विविध नामों से व्यवहार में लाये जाने पर भी एकमात्र सोना ही अनिवार्य सत्य होता है, उसी तरह इस ब्रह्माण्ड की सृष्टि के पूर्व, इसके संहार के बाद और इसके अस्तित्व के समय केवल मैं विद्यमान रहता हूँ।
 
श्लोक 20:  भौतिक मन चेतना की तीन अवस्थाओं—जाग्रत, सुप्ति तथा सुषुप्ति—में प्रकट होता है, जो प्रकृति के तीन गुणों से उत्पन्न हैं। फिर मन तीन भिन्न भिन्न भूमिकाओं में—द्रष्टा, दृश्य तथा अनुभूति के नियामक रूप में—प्रकट होता है। इस तरह मन तीनों उपाधियों में लगातार विविध प्रकारों से प्रकट होता है। किन्तु इन सबों से भिन्न एक चौथा तत्त्व भी विद्यमान रहता है और वही परब्रह्म होता है।
 
श्लोक 21:  जो भूतकाल में विद्यमान नहीं था और भविष्य में भी विद्यमान नहीं रहेगा, उसका उसकी पूरी अवधि में कोई अस्तित्व नहीं होता; वह केवल ऊपरी उपाधि होता है। मेरे मत में जो कुछ उत्पन्न किया जाता है तथा किसी अन्य वस्तु से उद्धाटित किया जाता है, वही अन्तत: एकमात्र अन्य वस्तु होता है।
 
श्लोक 22:  वास्तव में विद्यमान न होते हुए भी, रजोगुण से उत्पन्न रूपान्तरों की यह अभिव्यक्ति सत्य प्रतीत होती है क्योंकि स्वयं-व्यक्त, स्वयं-प्रकाशित परब्रह्म अपने को नाना प्रकार की इन्द्रियों, इन्द्रिय-विषयों, मन तथा शरीर के तत्त्वों के रूप में प्रकट करता है।
 
श्लोक 23:  इस तरह विवेकशील तर्क द्वारा परब्रह्म की अनन्य स्थिति को अच्छी तरह समझ करके मनुष्य को चाहिए कि पदार्थ से अपनी गलत पहचान का कुशलतापूर्वक निषेध करे और आत्मा की पहचान विषयक सारे संशयों को छिन्न-भिन्न कर डाले। आत्मा के स्वाभाविक आनन्द से तुष्ट होते हुए मनुष्य को भौतिक इन्द्रियों के काम-वासनामय कार्यों से दूर रहना चाहिए।
 
श्लोक 24:  पृथ्वी से बना भौतिक शरीर असली आत्मा नहीं है, न ही इन्द्रियाँ, उनके अधिष्ठातृ देवता या प्राण-वायु; न बाह्य वायु, जल, अथवा अग्नि या मन ही हैं। ये सब पदार्थ हैं। इसी तरह न तो मनुष्य की बुद्धि, न भौतिक चेतना, न अहंकार, न ही आकाश या पृथ्वी के तत्त्व, न ही इन्द्रिय अनुभूति के विषय, न भौतिक साम्य की आदि अवस्था ही को आत्मा की वास्तविक पहचान माना जा सकता है।
 
श्लोक 25:  जिसने मेरी पहचान भगवान् के रूप में कर ली है, उसके लिए इसमें क्या श्रेय रखा है यदि उसकी इन्द्रियाँ, जो गुणों से उत्पन्न हैं, ध्यान में पूरी तरह एकाग्र हों? दूसरी ओर, इसमें कौन-सा कलंक लगता है यदि उसकी इन्द्रियाँ चलायमान होती हैं? निस्सन्देह, इससे सूर्य का क्या बनता बिगड़ता है यदि बादल आते और जाते हैं?
 
श्लोक 26:  आकाश अपने में से होकर गुजरने वाली वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी के विविध गुणों को और उसी के साथ उष्मा तथा शीत के गुणों को भी प्रदर्शित कर सकता है, जो ऋतुओं के अनुसार निरन्तर आते-जाते रहते हैं। फिर भी, आकाश कभी भी इन गुणों से बँधता नहीं। इसी प्रकार परब्रह्म सतो, रजो तथा तमोगुणों के दूषणों से कभी बँधता नहीं क्योंकि ये मिथ्या अहंकार का भौतिक विकार उत्पन्न करने वाले हैं।
 
श्लोक 27:  तिस पर भी मनुष्य जब तक दृढ़तापूर्वक मेरी भक्ति का अभ्यास करके अपने मन से भौतिक काम-वासना के कल्मष को पूरी तरह निकाल नहीं फेंकता है, तब तक उसे इन भौतिक गुणों की संगति करने में सावधानी बरतनी चाहिए जो मेरी मायाशक्ति द्वारा उत्पन्न होते हैं।
 
श्लोक 28:  जिस तरह ठीक से उपचार न होने पर रोग फिर से लौट आता है और रोगी को बारम्बार कष्ट देता है, उसी तरह यदि मन को विकृत प्रवृत्तियों से पूरी तरह शुद्ध नहीं कर लिया जाता, तो वह भौतिक वस्तुओं में लिप्त रहने लगता है और अपूर्ण योगी को बारम्बार तंग करता रहता है।
 
श्लोक 29:  कभी कभी अपूर्ण योगी की उन्नति पारिवारिक सदस्यों, शिष्यों अथवा अन्यों के प्रति आसक्ति के कारण रुक जाती है क्योंकि ऐसे लोग इसी प्रयोजन से ईर्ष्यालु देवताओं द्वारा भेजे जाते हैं। किन्तु अपनी संचित उन्नति के बल पर ऐसे अपूर्ण योगी अगले जन्म में अपना योगाभ्यास फिर चालू कर देते हैं। वे फिर कभी सकाम कर्म के जाल में नहीं फँसते।
 
श्लोक 30:  सामान्य जीव भौतिक कर्म करता है और ऐसे कर्म के फल से रूपान्तरित हो जाता है। इस तरह वह विविध इच्छाओं से प्रेरित होकर अपनी मृत्यु तक सकाम कर्म करता रहता है। किन्तु बुद्धिमान व्यक्ति अपने स्वाभाविक आनन्द का अनुभव किये रहने से, सारी भौतिक इच्छाओं को त्याग देता है और सकाम कर्म में प्रवृत्त नहीं होता।
 
श्लोक 31:  बुद्धिमान व्यक्ति, जिसकी चेतना आत्मा में स्थित है, अपनी शारीरिक क्रियाओं पर भी ध्यान नहीं दे पाता। खड़े, बैठे, चलते, लेटे, मूत्र त्याग करते, भोजन करते या अन्य शारीरिक कार्य करते हुए भी, वह समझता है कि शरीर अपने स्वभाव के अनुसार कार्य करता है।
 
श्लोक 32:  यद्यपि स्वरूपसिद्ध आत्मा कभी कभी अशुद्ध वस्तु या कर्म को देख सकता है, किन्तु वह इसे सत्य नहीं मानता। अशुद्ध इन्द्रिय-विषयों को तर्क द्वारा मायावी भौतिक द्वैत पर आधारित समझ कर, बुद्धिमान व्यक्ति उन्हें सत्य से सर्वथा विपरीत और पृथक् मानता है, जिस तरह निद्रा से जगा हुआ मनुष्य अपने अस्पष्ट स्वप्न को देखता है।
 
श्लोक 33:  भौतिक अविद्या को, जो प्राकृतिक गुणों के कार्यों द्वारा नाना रूपों में विस्तार पाती है, बद्धजीव गलती से आत्मा मान बैठता है। किन्तु हे उद्धव, आध्यात्मिक ज्ञान के अनुशीलन से यही अविद्या मोक्ष के समय समाप्त हो जाती है। दूसरी ओर, नित्य आत्मा न तो कभी ग्रहण किया जा सकता है और न ही त्यागा जा सकता है।
 
श्लोक 34:  जब सूर्य उदय होता है, तो वह मनुष्यों की आँखों को ढकने वाले अंधकार को नष्ट कर देता है, किन्तु वह उन वस्तुओं को उत्पन्न नहीं करता जिन्हें मनुष्य अपने समक्ष देखते हैं क्योंकि वे तो पहले से वहीं पर थीं। इसी तरह मेरी शक्तिशाली तथा यथार्थ अनुभूति मनुष्य की असली चेतना को ढकने वाले अंधकार को नष्ट कर देगी।
 
श्लोक 35:  परमेश्वर स्वत: प्रकाशित, अजन्मा तथा अप्रमेय हैं। वे शुद्ध दिव्य चेतना हैं और हर वस्तु का अनुभव करते हैं। वे अद्वितीय हैं और जब सामान्य शब्द काम करना बन्द कर देते हैं, तभी उनकी अनुभूति होती है। उनके द्वारा वाक्शक्ति तथा प्राणों को गति प्राप्त होती है।
 
श्लोक 36:  आत्मा में जो भी ऊपरी द्वैत अनुभव किया जाता है, वह केवल मन का संशय होता है। निस्सन्देह, अपने ही आत्मा से पृथक् ऐसे कल्पित द्वैत के ठहर पाने का कोई आधार नहीं है।
 
श्लोक 37:  पाँच भौतिक तत्त्वों का द्वैत केवल नामों और रूपों में ही देखा जाता है। जो लोग कहते हैं कि यह द्वैत असली है, वे छद्म पण्डित हैं और वस्तुत: बिना आधार के व्यर्थ ही तरह-तरह के सिद्धान्त प्रस्तावित करते रहते हैं।
 
श्लोक 38:  अपने अभ्यास में अभी तक परिपक्व न होने वाले प्रयत्नशील योगी का शरीर कभी कभी विविध उत्पातों की चपेट में आ सकता है। अतएव निम्नलिखित विधि संस्तुत की जाती है।
 
श्लोक 39:  इनमें से कुछ व्यवधानों को योगिक ध्यान द्वारा या शारीरिक आसनों के द्वारा, जिनका अभ्यास प्राणायाम में एकाग्रता के साथ साथ किया जाता है, दूर किया जा सकता है और अन्य व्यवधानों को विशेष तपस्या, मंत्रों या जड़ी-बूटियों से बनी ओषधियों द्वारा दूर किया जा सकता है।
 
श्लोक 40:  इन अशुभ उत्पातों को मेरा स्मरण करके, मेरे नामों का सामूहिक श्रवण और कीर्तन करके या योग के महान् स्वामियों के पदचिन्हों पर चल कर धीरे धीरे दूर किया जा सकता है।
 
श्लोक 41:  कुछ योगीजन विविध उपायों से शरीर को रोग तथा वृद्धावस्था से मुक्त कर लेते हैं और उसे शाश्वत तरुण बनाये रखते हैं। इस तरह वे भौतिक योग-सिद्धियाँ पाने के उद्देश्य से योग में प्रवृत्त होते हैं।
 
श्लोक 42:  जो लोग दिव्य ज्ञान में पटु हैं, वे इस योग की शारीरिक सिद्धि को अत्यधिक महत्त्व नहीं देते। निस्सन्देह, वे ऐसी सिद्धि के लिए किये गये प्रयास को व्यर्थ मानते हैं क्योंकि आत्मा तो वृक्ष के सदृश स्थायी है किन्तु शरीर वृक्ष के फल की तरह विनाशशील है।
 
श्लोक 43:  यद्यपि योग की विभिन्न विधियों से शरीर सुधर सकता है, किन्तु बुद्धिमान व्यक्ति, जिसने अपना जीवन मुझे समर्पित कर दिया है योग के द्वारा शरीर को पूर्ण बनाने पर अपनी श्रद्धा नहीं दिखलाता और वास्तव में वह ऐसी विधियों को त्याग देता है।
 
श्लोक 44:  जिस योगी ने मेरी शरण ग्रहण कर ली है, वह लालसा से मुक्त रहता है क्योंकि वह भीतर ही भीतर आत्मा के सुख का अनुभव करता है। इस तरह इस योग-विधि को सम्पन्न करते हुए वह कभी विघ्न-बाधाओं से पराजित नहीं होता।
 
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