श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 4: राजा निमि से द्रुमिल द्वारा ईश्वर के अवतारों का वर्णन  » 

 
 
संक्षेप विवरण:  इस अध्याय में भगवान् श्री हरि के भूत, वर्तमान तथा भावी अवतारों के विविध रूपों तथा इन अवतारों में से हर एक के दिव्य गुणों का वर्णन किया गया है। भले ही इस पृथ्वी...
 
श्लोक 1:  राजा निमि ने कहा : भगवान् अपनी अन्तरंगा शक्ति से तथा अपनी इच्छानुसार भौतिक जगत में अवतरित होते हैं। अतएव आप हमें भगवान् हरि की उन विविध लीलाओं को बतलायें, जिन्हें उन्होंने भूतकाल में सम्पन्न किया, इस समय कर रहे हैं और अपने विविध अवतारों में भविष्य में सम्पन्न करेंगे।
 
श्लोक 2:  श्री द्रुमिल ने कहा : अनन्त भगवान् के अनन्त गुणों का वर्णन करने या गिनने का प्रयास करने वाले व्यक्ति की बुद्धि मूर्ख बालक जैसी होती है। भले ही कोई महान् प्रतिभाशाली व्यक्ति किसी तरह से पृथ्वी की सतह के धूल-कणों की गिनती करने का समय-अपव्ययी प्रयास कर ले, किन्तु ऐसा व्यक्ति भगवान् के आकर्षक गुणों की गणना नहीं कर सकता, क्योंकि भगवान् समस्त शक्तियों के आगार हैं।
 
श्लोक 3:  जब आदि भगवान् नारायण ने अपने में से उत्पन्न पाँच तत्त्वों से अपने विराट शरीर की रचना की और फिर अपने ही अंश से उस विराट शरीर में प्रविष्ट हो गये, तो वे पुरुष नाम से विख्यात हुए।
 
श्लोक 4:  उनके शरीर के भीतर इस ब्रह्माण्ड के तीनों लोक विस्तृत रूप से स्थित हैं। उनकी दिव्य इन्द्रियाँ समस्त देहधारी जीवों की ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों को उत्पन्न करती हैं। उनकी चेतना से बद्ध-ज्ञान उत्पन्न होता है और उनके प्रबल श्वास से देहधारी जीवों का शारीरिक बल, ऐन्द्रिय शक्ति तथा बद्ध-कर्म उत्पन्न होते हैं। वे सतो, रजो तथा तमोगुणों के माध्यम से आदि गति प्रदान करने वाले हैं। इस प्रकार ब्रह्माण्ड का सृजन, पालन और संहार होता है।
 
श्लोक 5:  प्रारम्भ में आदि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने इस ब्रह्माण्ड की सृष्टि करने के निमित्त रजोगुण के माध्यम से ब्रह्मा का रूप प्रकट किया। भगवान् ने ब्रह्माण्ड का पालन करने के लिए विष्णु रूप में अपना स्वरूप प्रकट किया, जो यज्ञ का स्वामी है और द्विजन्मा ब्राह्मणों तथा उनके धार्मिक कर्तव्यों का रक्षक है। और जब ब्रह्माण्ड का संहार करना होता है, तो यही भगवान् तमोगुण का प्रयोग करते हुए अपना रुद्र-रूप प्रकट करते हैं। इस तरह उत्पन्न किये गये जीव सदैव सृष्टि, पालन तथा संहार की शक्तियों के अधीन रहते हैं।
 
श्लोक 6:  परम शान्त तथा ऋषियों में श्रेष्ठ नर-नारायण ऋषि का जन्म धर्म तथा उनकी पत्नी दक्षपुत्री मुर्ति के पुत्र के रूप में हुआ था। नर-नारायण ऋषि ने भगवद्भक्ति की शिक्षा दी, जिससे भौतिक कर्म का अन्त हो जाता है और उन्होंने स्वयं इस ज्ञान का पूरी तरह से अभ्यास किया। वे आज भी जीवित हैं और उनके चरणकमलों की सेवा बड़े बड़े सन्त-पुरुषों द्वारा की जाती है।
 
श्लोक 7:  यह सोच कर कि नर-नारायण ऋषि अपनी कठिन तपस्या से अत्यन्त शक्तिशाली बन कर उसका स्वर्ग का राज्य छीन लेंगे, राजा इन्द्र भयभीत हो उठा। इस तरह भगवान् के अवतार की दिव्य महिमा को न जानते हुए इन्द्र ने कामदेव तथा उसके संगियों को भगवान् के आवास बदरिकाश्रम भेजा। जब वसन्त ऋतु की मनोहारी मन्द वायु ने अत्यन्त कामुक वातावरण उत्पन्न कर दिया, तो स्वयं कामदेव ने सुन्दर स्त्रियों की बाँकी चितवनों के तीरों से भगवान् पर आक्रमण किया।
 
श्लोक 8:  इन्द्र द्वारा किये गये अपराध को समझते हुए आदि भगवान् गर्वित नहीं हुए। अपितु कामदेव तथा कँपकँपा रहे उसके साथियों से वे हँसते हुए इस प्रकार बोले, “हे शक्तिशाली मदन, हे वायु-देव तथा देवताओं की पत्नियो, डरो नहीं। कृपया मेरे द्वारा दी जाने वाली भेंटें स्वीकार करो और अपनी उपस्थिति से मेरे आश्रम को पवित्र बनाओ।”
 
श्लोक 9:  हे राजा निमि, जब नर-नारायण ऋषि ने देवताओं के भय को दूर करते हुए इस प्रकार कहा, तो उन्होंने लज्जा से अपने सिर झुका लिये और भगवान् से दया की भीख माँगते हुए इस प्रकार बोले, “हे प्रभु, आप सदैव दिव्य हैं, मोह की पहुँच से परे हैं, अतएव आप नित्य अविकारी हैं। हमारे महान् अपराध के बावजूद आपकी अहैतुकी कृपा आपमें कोई असामान्य घटना नहीं है, क्योंकि असंख्य आत्माराम तथा क्रोध और मिथ्या अहंकार से मुक्त मुनिजन आपके चरणकमलों पर विनयपूर्वक अपना शीश झुकाते हैं।
 
श्लोक 10:  देवतागण उन लोगों के मार्ग में अनेक अवरोध प्रस्तुत करते हैं, जो देवताओं के अस्थायी आवासों को लाँघ कर, आपके परम धाम पहुँचने के लिए आपकी पूजा करते हैं। वे लोग, जो यज्ञों में देवताओं को उनका नियत भाग भेंट में दे देते हैं, ऐसे किसी अवरोध का सामना नहीं करते। किन्तु क्योंकि आप अपने भक्त के प्रत्यक्ष रक्षक हैं, अतएव वह उन सभी अवरोधों को, जो उसके सामने देवताओं द्वारा रखे जाते हैं, लाँघ जाने में समर्थ होता है।
 
श्लोक 11:  कुछ लोग तो ऐसे हैं, जो हमारे प्रभाव को लाँघने के उद्देश्य से कठिन तपस्या करते हैं, जो भूख, प्यास, गर्मी, सर्दी तथा कालजनित अन्य परिस्थितियों यथा रसनेन्द्रिय और जननेन्द्रिय के वेगों की अन्तहीन लहरों से युक्त अगाध समुद्र की तरह है। इस तरह कठिन तपस्या के द्वारा इन्द्रिय-तृप्ति के इस समुद्र को पार कर लेने पर भी, ऐसे व्यक्ति व्यर्थ के क्रोध के वशीभूत होने पर मूर्खता से गो-खुर में डूब जाते हैं। इस तरह वे अपनी कठिन तपस्या के लाभ को व्यर्थ गँवा बैठते हैं।
 
श्लोक 12:  जब देवतागण इस तरह से भगवान् की प्रशंसा कर रहे थे, तो सर्वशक्तिमान प्रभु ने सहसा उनकी आँखों के सामने अनेक स्त्रियाँ प्रकट कर दीं, जो आश्चर्यजनक ढंग से भव्य लगती थीं और सुन्दर वस्त्रों तथा आभूषणों से सज्जित थीं और भगवान् की सेवा में लगी हुई थीं।
 
श्लोक 13:  जब देवताओं के अनुयायियों ने नर-नारायण ऋषि द्वारा उत्पन्न स्त्रियों के मोहक सौन्दर्य की ओर निहारा और उनके शरीरों की सुगन्ध को सूँघा तो उनके मन मुग्ध हो गये। निस्सन्देह ऐसी स्त्रियों के सौन्दर्य तथा उनकी भव्यता को देख कर देवताओं के अनुयायी अपने ऐश्वर्य को तुच्छ समझने लगे।
 
श्लोक 14:  तब देवों के परमेश्वर किंचित मुसकाये और अपने समक्ष नतमस्तक स्वर्ग के प्रतिनिधियों से कहा, “तुम इन स्त्रियों में से जिस किसी को भी अपने उपयुक्त समझो, उसे चुन लो। वह स्वर्गलोक की आभूषण (शोभा बढ़ाने वाली) बन जायेगी।”
 
श्लोक 15:  देवताओं के उन सेवकों ने ॐ शब्द का उच्चारण करते हुए अप्सराओं में सर्वोत्कृष्ट उर्वशी को चुन लिया। वे आदरपूर्वक उसे आगे करके स्वर्गलोक लौट गए।
 
श्लोक 16:  देवताओं के सेवक इन्द्र-सभा में जा पहुँचे और तीनों स्वर्गों के निवासियों के सुनते सुनते उन्होंने इन्द्र से नारायण के परम बल के बारे में बतलाया। जब इन्द्र ने नर-नारायण ऋषि के बारे में सुना और अपने अपराध के विषय में अवगत हुआ, तो वह डरा और चकित भी हुआ।
 
श्लोक 17:  अच्युत भगवान् विष्णु इस जगत में अपने विविध आंशिक अवतारों के रूप में अवतरित हुए हैं यथा हंस, दत्तात्रेय, चारों कुमार तथा हमारे अपने पिता, महान् ऋषभदेव। ऐसे अवतारों के द्वारा भगवान् सारे ब्रह्माण्ड के लाभ हेतु आत्म-साक्षात्कार का विज्ञान पढ़ाते हैं। उन्होंने हयग्रीव के रूप में प्रकट होकर मधु असुर का वध किया और इस तरह वे पाताल-लोक से वेदों को वापस लाये।
 
श्लोक 18:  मत्स्य अवतार में भगवान् ने सत्यव्रत मनु, पृथ्वी तथा उसकी मूल्यवान औषधियों की रक्षा की। उन्होंने प्रलय-जल से उनकी रक्षा की। सूकर के रूप में भगवान् ने दिति-पुत्र हिरण्याक्ष का वध किया और ब्रह्माण्ड-जल से पृथ्वी का उद्धार किया। कच्छप-रूप में उन्होंने अपनी पीठ पर मन्दर पर्वत को उठा लिया, जिससे समुद्र को मथ कर अमृत निकाला जा सके। भगवान् ने शरणागत गजेन्द्र को बचाया, जो घडिय़ाल के चँगुल में भीषण यातना पा रहा था।
 
श्लोक 19:  भगवान् ने वालखिल्य नामक लघु-रुप मुनियों का भी उद्धार किया, जब वे गो-खुर-जल में गिर गये थे और इन्द्र उन पर हँस रहा था। तत्पश्चात्, भगवान् ने इन्द्र को भी बचाया, जो वृत्रासुर-वध के पापकर्म के फलस्वरूप अंधकार से प्रच्छन्न था। जब देव-पत्नियाँ असुरों के महल में असहाय होकर बन्दी बनाई गई थीं, तो भगवान् ने ही उन्हें बचाया। अपने नृसिंह- अवतार में भगवान् ने अपने सन्त-भक्तों का भय दूर करने के लिए असुरराज हिरण्यकशिपु का वध किया था।
 
श्लोक 20:  भगवान् देवताओं तथा असुरों के बीच होने वाले युद्धों का लाभ निरन्तर असुरों-नायकों को मारने के लिए उठाते हैं। इस प्रकार भगवान् प्रत्येक मन्वन्तर में अपने विभिन्न अवतारों के माध्यम से ब्रह्माण्ड की रक्षा करके देवताओं को प्रोत्साहित करते हैं। भगवान् वामन के रूप में भी प्रकट हुए और तीन पग भूमि माँगने के बहाने बलि महाराज से पृथ्वी ले ली। तत्पश्चात्, भगवान् ने अदिति-पुत्रों को सारा जगत वापस कर दिया।
 
श्लोक 21:  परशुराम का जन्म भृगुवंश में अग्नि के रूप में हुआ, जिसने हैहय कुल को जलाकर भस्म कर दिया। इस प्रकार भगवान् परशुराम ने पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से विहीन कर दिया। वही भगवान् सीतादेवी के पति रामचन्द्र के रूप में प्रकट हुए और उन्होंने दस सिरों वाले रावण को लंका के सारे सैनिकों समेत मारा। वे श्रीराम जिनकी कीर्ति संसार के कल्मष को नष्ट करती है सदैव विजयी हों!
 
श्लोक 22:  पृथ्वी का भार उतारने के लिए अजन्मा भगवान् यदुवंश में जन्म लेंगे और ऐसे कर्म करेंगे, जो देवताओं के लिए भी कर पाना असम्भव है। वे बुद्ध के रूप में तर्कदर्शन की स्थापना करते हुए अयोग्य वैदिक यज्ञकर्ताओं को मोहित करेंगे। और कल्कि के रूप में वे कलियुग के अन्त में अपने को शासक बतलाने वाले सारे निम्न श्रेणी के लोगों का वध करेंगे।
 
श्लोक 23:  हे महाबाहु राजा, ब्रह्माण्ड के स्वामी भगवान् के ऐसे जन्म तथा कर्म असंख्य हैं, जिस तरह कि मैं वर्णन कर चुका हूँ। वस्तुत: भगवान् की कीर्ति अनन्त है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥