श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 1: कलियुग के पतित वंश  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक
नव नन्दान् द्विज: कश्चित् प्रपन्नानुद्धरिष्यति ।
तेषामभावे जगतीं मौर्या भोक्ष्यन्ति वै कलौ ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
नव—नौ; नन्दान्—नन्दों (नन्द तथा उसके आठ पुत्रों); द्विज:—ब्राह्मण; कश्चित्—कोई; प्रपन्नान्—विश्वास करते हुए; उद्धरिष्यति—उन्मूलन करेगा; तेषाम्—उनकी; अभावे—अनुपस्थिति में; जगतीम्—पृथ्वी; मौर्या:—मौर्य वंश; भोक्ष्यन्ति—शासन करेगा; वै—निस्सन्देह; कलौ—इस कलियुग में ।.
 
अनुवाद
 
 कोई एक ब्राह्मण (चाणक्य) राजा नन्द तथा उसके आठ पुत्रों के साथ विश्वासघात करेगा और उनके वंश का विनाश कर देगा। उनके न रहने पर कलियुग में मौर्यगण विश्व पर शासन करेंगे।
 
तात्पर्य
 श्रीधर स्वामी तथा विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर दोनों ही पुष्टि करते हैं कि यहाँ पर उल्लिखित ब्राह्मण चाणक्य है, जिसका दूसरा नाम कौटिल्य या वात्स्यायन है। श्रीमद्भागवत की यह महान् ऐतिहासिक कथा जो विराट जगत के प्राकट्य के पूर्व की घटनाओं से प्रारम्भ होती है, अब आधुनिक प्रलेखित इतिहास के क्षेत्र में प्रवेश करती है। आधुनिक इतिहासकार मौर्य वंश को तथा चन्द्रगुप्त को जिस राजा का निम्नलिखित श्लोक में वर्णन किया गया है, दोनों को, मान्यता प्रदान करते हैं।
 
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