श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 1: कलियुग के पतित वंश  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक
प्रजाश्चाब्रह्मभूयिष्ठा: स्थापयिष्यति दुर्मति: ।
वीर्यवान् क्षत्रमुत्साद्य पद्मवत्यां स वै पुरि ।
अनुगङ्गमाप्रयागं गुप्तां भोक्ष्यति मेदिनीम् ॥ ३५ ॥
 
शब्दार्थ
प्रजा:—नागरिक; च—तथा; अब्रह्म—जो ब्राह्मण नहीं है; भूयिष्ठा:—मुख्य रूप से; स्थापयिष्यति—बनायेगा; दुर्मति:— मूर्ख (विश्वस्फूर्जि); वीर्य-वन्—शक्तिशाली; क्षत्रम्—क्षत्रिय जाति; उत्साद्य—विनष्ट करके; पद्मवत्याम्—पद्मवती में; स:—वह; वै—निस्सन्देह; पुरि—नगरी में; अनु-गङ्गम्—गंगा द्वारा (हरद्वार) से; आ-प्रयागम्—प्रयाग तक; गुप्ताम्— सुरक्षित; भोक्ष्यति—शासन करेगा; मेदिनीम्—पृथ्वी पर ।.
 
अनुवाद
 
 मूर्ख राजा विश्वस्फूर्जि सारे नागरिकों को नास्तिकता की ओर ले जाएगा और अपनी शक्ति का उपयोग क्षत्रिय जाति को पूर्णतया ध्वंस करने में करेगा। वह अपनी राजधानी पद्मवती में गंगा के उद्गम से लेकर प्रयाग तक शासन करेगा।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥