श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 1: कलियुग के पतित वंश  » 
 
 
 
संक्षेप विवरण
 
 श्रीमद्भागवत का बारहवाँ स्कन्ध श्रील शुकदेव गोस्वामी की इस भविष्यवाणी से प्रारम्भ होता है कि कलियुग में आगे चल कर इस पृथ्वी पर कौन-कौन से राजे उत्पन्न होंगे। तत्पश्चात् वे इस युग के अनेक दोष गिनाते हैं जिसके बाद पृथ्वी की अधिष्ठात्री देवी उन मूर्ख राजाओं का व्यंग्यपूर्वक निरादर करती है, जो लगातार उसको जीतने का प्रयास करते रहते हैं। तत्पश्चात् शुकदेव गोस्वामी भौतिक प्रलय की चार कोटियाँ बतलाते हैं और अन्त में महाराज परीक्षित को अपनी सलाह देते हैं। इसके पश्चात् राजा परीक्षित को तक्षक सर्प डस लेता है, जिससे वे इस जगत से प्रयाण कर जाते हैं। सूत गोस्वामी नैमिषारण्य में मुनियों को वेदों तथा पुराणों की विविध शाखाओं के आचार्यों का नाम गिनाकर, मार्कण्डेय ऋषि का पवित्र इतिहास बताकर, भगवान् के विराट रूप की तथा सूर्य देव के रूप में उनके अंश की महिमा का गायन करके, इस ग्रंथ में विवेचित कथाओं का सारांश देकर तथा अन्तिम वर तथा स्तुतियाँ प्रदान करके, श्रीमद्भागवत का वाचन बन्द कर देते हैं।
इस स्कन्ध के प्रथम अध्याय में मगध राजवंश के भावी राजाओं का कलियुग के प्रभाव से भ्रष्ट होने का संक्षिप्त वर्णन मिलता है। सूर्य देव के वंश में पुरु के कुल में बीस राजाओं ने राज्य किया जिनमें उपरिचर वसु से प्रारम्भ करके पुरञ्जय तक सारे नाम गिनाये गये हैं। पुरञ्जय के बाद इस वंश की परम्परा भ्रष्ट हो जायेगी। पुरञ्जय के बाद पाँच राजा होंगे जो प्रद्योतन कहलायेंगे जिनके बाद शिशुनाग, मौर्य, शुंग, काण्व, अन्ध्र राष्ट्र के तीस राजा, सात आभीर, दस गर्दभी, सोलह कंक, आठ यवन, चौदह तुरुष्क, दस गुरुण्ड, ११ मौल, ५ किलकिला एकछत्र राजा तथा १३ बाह्लीक होंगे। इसके बाद विभिन्न राज्यों में एक ही समय पर ७ अंध्र राजा, ७ कौशल, विदूर राजा तथा निषध राज्य करेंगे। तत्पश्चात् मगध राज्यों की बागडोर ऐसे राजाओं के हाथों चली जायेगी जो शूद्र तथा म्लेच्छ जैसे होंगे और पूर्णत: अधर्म में निमग्न रहेंगे।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
About Us | Terms & Conditions
Privacy Policy | Refund Policy
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥