श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 10: शिव तथा उमा द्वारा मार्कण्डेय ऋषि का गुणगान  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक
धर्मं ग्राहयितुं प्राय: प्रवक्तारश्च देहिनाम् ।
आचरन्त्यनुमोदन्ते क्रियमाणं स्तुवन्ति च ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
धर्मम्—धर्म; ग्राहयितुम्—स्वीकार करवाना; प्राय:—अधिकांशत:; प्रवक्तार:—वैध वक्ताओं; च—तथा; देहिनाम्— सामान्य देहधारियों के लिए; आचरन्ति—कर्म करते हैं; अनुमोदन्ते—प्रोत्साहित करते हैं; क्रियमाणम्—सम्पन्न करने वाला; स्तुवन्ति—स्तुति करते हैं; च—भी ।.
 
अनुवाद
 
 सामान्यतया देहधारी जीवों को धार्मिक सिद्धान्त स्वीकार करने के लिए प्रेरित करने के लिए ही प्रामाणिक धर्माचार्य, अन्यों को प्रोत्साहित करके तथा उनके आचरण की प्रशंसा करके, आदर्श आचरण प्रदर्शित करते हैं।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥