श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 10: शिव तथा उमा द्वारा मार्कण्डेय ऋषि का गुणगान  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक
सोऽप्यवाप्तमहायोगमहिमा भार्गवोत्तम: ।
विचरत्यधुनाप्यद्धा हरावेकान्ततां गत: ॥ ३९ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह, मार्कण्डेय; अपि—निस्सन्देह; अवाप्त—प्राप्त करके; महा-योग—योग की सर्वोच्च सिद्धि की; महिमा— महिमा; भार्गव-उत्तम:—श्रेष्ठ भृगुवंशी; विचरति—विचरण कर रहा है; अधुना अपि—आज भी; अद्धा—प्रत्यक्ष; हरौ— हरि के लिए; एक-अन्तताम्—एकान्तिक भक्ति का पद; गत:—प्राप्त करके ।.
 
अनुवाद
 
 श्रेष्ठ भृगुवंशी मार्कण्डेय ऋषि अपनी योग-सिद्धि की उपलब्धि के कारण यशस्वी हैं। आज भी वे इस जगत में भगवान् की अनन्य भक्ति में पूरी तरह लीन होकर विचरण करते हैं।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥