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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 11: महापुरुष का संक्षिप्त वर्णन  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  12.11.46 
द्वादशस्वपि मासेषु देवोऽसौ षड्‌भिरस्य वै ।
चरन् समन्तात्तनुते परत्रेह च सन्मतिम् ॥ ४६ ॥
 
शब्दार्थ
द्वादशसु—बारहों; अपि—निस्सन्देह; मासेषु—महीनों में; देव:—स्वामी; असौ—इस; षड्भि:—छ: प्रकार के संगियों समेत; अस्य—इस ब्रह्माण्ड के लोगों के लिए; वै—निश्चय ही; चरन्—विचरण करते हुए; समन्तात्—सभी दिशाओं में; तनुते—विस्तार करता है; परत्र—अगले जीवन में; इह—इस जीवन में; —तथा; सत्-मतिम्—शुद्ध चेतना ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार बारहों महीने सूर्य देव अपने छ: प्रकार के संगियों के साथ सभी दिशाओं में विचरण करते हुए इस ब्रह्माण्ड के निवासियों में इस जीवन तथा अगले जीवन के लिए शुद्ध चेतना का विस्तार करता रहता है।
 
 
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