श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 13: श्रीमद्भागवत की महिमा  »  श्लोक 13

 
श्लोक
प्रौष्ठपद्यां पौर्णमास्यां हेमसिंहसमन्वितम् ।
ददाति यो भागवतं स याति परमां गतिम् ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
प्रौष्ठपद्याम्—भाद्र मास में; पौर्णमास्याम्—पूर्णमासी के दिन; हेम-सिंह—सोने के सिंहासन पर; समन्वितम्—आसीन; ददाति—भेंट के रूप में देता है; य:—जो; भागवतम्—श्रीमद्भागवत को; स:—वह; याति—जाता है; परमाम्—परम; गतिम्—गन्तव्य को ।.
 
अनुवाद
 
 यदि कोई व्यक्ति भाद्र मास की पूर्णमासी को सोने के सिंहासन पर रख कर श्रीमद्भागवत का दान उपहार के रूप में देता है, तो उसे परम दिव्य गन्तव्य प्राप्त होगा।
 
तात्पर्य
 श्रीमद्भागवत को सोने के सिंहासन पर रखना चाहिए क्योंकि यह समस्त वाङ्मय का राजा है। भाद्र मास की पूर्णमासी को वाङ्मय का राजा-रूप सूर्य, सिंह राशि पर स्थित होता है और ऐसा दिखता है मानो
राज-सिंहासन पर बैठाया गया हो (ज्योतिष के अनुसार सूर्य सिंह राशिमें सर्वोच्च स्थिति पर होता है) इस तरह मनुष्य बिना किसी बंधन के इस परम दिव्य ग्रंथ श्रीमद्भागवत की पूजा कर सकता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥