श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 13: श्रीमद्भागवत की महिमा  »  श्लोक 14

 
श्लोक
राजन्ते तावदन्यानि पुराणानि सतां गणे ।
यावद्भ‍ागवतं नैव श्रूयतेऽमृतसागरम् ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
राजन्ते—चमकते हैं; तावत्—तब तक; अन्यानि—अन्य; पुराणानि—पुराण; सताम्—साधु पुरुषों की; गणे—सभा में; यावत्—जब तक; भागवतम्—श्रीमद्भागवत को; न—नहीं; एव—निस्सन्देह; श्रूयते—सुना जाता है; अमृत-सागरम्— अमृत का सागर ।.
 
अनुवाद
 
 अन्य सारे पुराण तब तक सन्त भक्तों की सभा में चमकते हैं जब तक अमृत के महासागर श्रीमद्भागवत को नहीं सुना जाता।
 
तात्पर्य
 अन्य वैदिक ग्रंथ तथा संसार के अन्य शास्त्र तब तक प्रधान बने रहते हैं जब तक श्रीमद्भागवत को भलीभाँति सुना और समझा नहीं जाता। श्रीमद्भागवत अमृत का सागर
है और सर्वोच्च ग्रंथ है। श्रीमद्भागवत के श्रद्धापूर्ण श्रवण, वाचन तथा वितरण से संसार पवित्र हो जायेगा और अन्य निकृष्ट ग्रंथ फीके पड़ जायेंगे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥