श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 13: श्रीमद्भागवत की महिमा  »  श्लोक 21

 
श्लोक
योगीन्द्राय नमस्तस्मै शुकाय ब्रह्मरूपिणे ।
संसारसर्पदष्टं यो विष्णुरातममूमुचत् ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
योगि-इन्द्राय—योगियों के राजा को; नम:—नमस्कार; तस्मै—उस; शुकय—शुकदेव गोस्वामी को; ब्रह्म-रूपिणे— परब्रह्म के साकार रूप; संसार-सर्प—संसार रूपी सर्प द्वारा; दष्टम्—काटा हुआ; य:—जिसने; विष्णु-रातम्—महाराज परीक्षित को; अमूमुचत्—मुक्त कर दिया ।.
 
अनुवाद
 
 मैं श्री शुकदेव गोस्वामी को सादर नमस्कार करता हूँ जो श्रेष्ठ योगी-मुनि हैं और परब्रह्म के साकार रूप हैं। उन्होंने संसार रूपी सर्प द्वारा काटे गये परीक्षित महाराज को बचाया।
 
तात्पर्य
 अब सूत गोस्वामी अपने गुरु शुकदेव गोस्वामी को नमस्कार करते हैं। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर यह स्पष्ट करते हैं कि जिस तरह अर्जुन को भौतिक मोह में डाल दिया गया था जिससे भगवद्गीता का प्रवचन हो सके, उसी तरह भगवान् के शुद्ध मुक्त भक्त राजा परीक्षित को मरने का शाप दिया गया
जिससे श्रीमद्भागवत कही जा सके। वस्तुत: राजा परीक्षित विष्णुरात हैं अर्थात् वे शतत् भगवान् के संरक्षण में रहते हैं। शुकदेव गोस्वामी ने शुद्ध भक्त के दयामय स्वभाव को तथा उसकी संगति के प्रबुद्धकारी प्रभाव को दिखाने के लिए राजा को उसके तथाकथित मोह से छुटकारा दिला दिया।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥