श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 13: श्रीमद्भागवत की महिमा  »  श्लोक 23

 
श्लोक
नामसङ्कीर्तनं यस्य सर्वपापप्रणाशनम् ।
प्रणामो दु:खशमनस्तं नमामि हरिं परम् ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
नाम-सङ्कीर्तनम्—नाम का सामूहिक कीर्तन; यस्य—जिसका; सर्व-पाप—सारे पापों को; प्रणाशनम्—नष्ट करने वाले; प्रणाम:—नमस्कार; दु:ख—दुख का; शमन:—शमन करने वाले; तम्—उसको; नमामि—नमस्कार करता हूँ; हरिम्— हरि को; परम्—परम ।.
 
अनुवाद
 
 मैं उन भगवान् हरि को सादर नमस्कार करता हूँ जिनके पवित्र नामों का सामूहिक कीर्तन सारे पापों को नष्ट करता है और जिनको नमस्कार करने से सारे भौतिक कष्टों से छुटकारा मिल जाता है।
 
 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के बारहवें स्कन्द के अन्तर्गत “श्रीमद्भागवत की महिमा” नामक तेरहवें अध्याय के श्रील भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद के विनीत सेवकों द्वारा रचित तात्पर्य पूर्ण हुए।
यह बारहवाँ स्कन्ध रविवार दिनांक १८ जुलाई १९८२ को गैन्सविले, फ्लोरिडा में पूरा हुआ।
बारहवाँ स्कंध पूर्ण हुआ
हम ॐ विष्णुपाद परमहंस परिव्राजकाचार्य अष्टोत्तरशत श्री श्रीमद् भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद को और उनकी कृपा से वृन्दावन के षड् गोस्वामियों को, श्री चैतन्य महाप्रभु तथा उनके नित्य संगियों को, श्री श्री राधाकृष्ण को तथा परम दिव्य ग्रंथ श्रीमद्भागवत को सादर नमस्कार करते हैं। श्रील प्रभुपाद की अहैतुकी कृपा से हम श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर, श्रील जीव गोस्वामी, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर, श्रील श्रीधर स्वामी तथा अन्य महान् वैष्णव आचार्यों के चरणकमलों तक पहुँच पाये और उनकी मुक्त टीकाओं का ध्यानपूर्वक अध्ययन करके हमने श्रीमद्भागवत को पूर्ण करने का विनीत प्रयास किया है। हम अपने गुरु श्रील प्रभुपाद के तुच्छ सेवक हैं और उनकी कृपा से श्रीमद्भागवत को प्रस्तुत करके हमें उनकी सेवा करने की अनुमति प्राप्त हो सकी है।
 
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥