श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 13: श्रीमद्भागवत की महिमा  » 

 
संक्षेप विवरण
 
 इस अन्तिम अध्याय में श्री सूत गोस्वामी ने प्रत्येक पुराण के विस्तार के साथ-साथ श्रीमद्भागवत की कथावस्तु, उसके उद्देश्य, उसके भेंट-रूप दिये जाने की विधि, ऐसी भेंट देने की महिमा तथा इसके कीर्तन करने तथा सुनने की महिमा का वर्णन किया है।
पुराणों का समग्र विस्तार ४ लाख श्लोकों में है जिनमें से अठारह हजार श्लोक श्रीमद्भागवत में हैं। इस श्रीमद्भागवत का उपदेश भगवान् नारायण ने ब्रह्मा को दिया था। इसकी कथाएँ पदार्थ से वैराग्य उत्पन्न कराती हैं और इसमें सारे वेदान्त का सार निहित है। जो व्यक्ति श्रीमद्भागवत को भेंटस्वरूप देता है उसे परम पद प्राप्त होगा। सारे पुराणों में श्रीमद्भागवत सर्वश्रेष्ठ है और यह वैष्णवों को सर्वाधिक प्रिय वस्तु है। यह परमहंसों के लिए उपलब्ध निर्मल परम ज्ञान को प्रकट करता है और सकाम कर्म के फलों से मुक्त होने की विधि भी बताता है—यह विधि ज्ञान, वैराग्य तथा भक्ति से ओतप्रोत है।

इस तरह भागवत की महिमा बताकर सूत गोस्वामी श्री नारायण का ध्यान आदि परब्रह्म के रूप में करते हैं, जो नितान्त शुद्ध, कल्मषरहित, शोक से रहित तथा अमर है। तत्पश्चात् वे सबसे बड़े योगी श्री शुकदेव को नमस्कार करते हैं, जो परब्रह्म से अभिन्न हैं। अन्त में भक्तिपूर्वक स्तुति करते हुए सूत गोस्वामी भगवान् श्री हरि को नमस्कार करते हैं, जो सारा कष्ट हरने वाले हैं।

 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥