श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 1: ईश अनुभूति का प्रथम सोपान  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक
किं प्रमत्तस्य बहुभि: परोक्षैर्हायनैरिह ।
वरं मुहूर्तं विदितं घटते श्रेयसे यत: ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
किम्—क्या है; प्रमत्तस्य—मोहग्रस्त का; बहुभि:—बहुतों के द्वारा; परोक्षै:—अनुभव-विहीन; हायनै:—वर्षों तक; इह—इस संसार में; वरम्—श्रेष्ठ; मुहूर्तम्—एक क्षण; विदितम्—चेतन; घटते—प्रयास कर सकता है; श्रेयसे—परमार्थ के मामले में; यत:—जिससे ।.
 
अनुवाद
 
 ऐसे दीर्घ जीवन से क्या लाभ, जिसे इस संसार में वर्षों तक अनुभवहीन बने रहकर गँवा दिया जाये? इससे तो अच्छा है पूर्ण चेतना का एक क्षण, क्योंकि इससे उसके परम कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।
 
तात्पर्य
 श्रील शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित को प्रत्येक प्रगतिशील व्यक्ति द्वारा भगवान् के पवित्र नाम का जप करने की महत्ता का उपदेश दिया। राजा को प्रोत्साहित करने के लिए श्रील शुकदेव गोस्वामी ने जोर देकर कहा कि जीवन की समस्याओं को जाने बिना सैकड़ों वर्षों तक जीवित रहने से कोई लाभ नहीं—इससे तो परमार्थ की चेतना से युक्त एक क्षण का भी जीवन श्रेयस्कर है। जीवन का परमार्थ सत्, चित् तथा आनन्द से पूर्ण है। जो लोग भौतिक जगत के बाह्य लक्षणों से मोहग्रस्त रहते हैं और ‘खाओ, पीओ, मौज करो’ जैसी पाशविक वृत्ति में लगे रहते हैं, वे मूल्यवान समय को व्यर्थ ही गुजारते हुए अपने जीवन को गँवा रहे हैं। हमें पूर्ण चेतना में रहकर यह समझ लेना चाहिए कि बद्धजीव को यह मनुष्य-जीवन आध्यात्मिक सफलता प्राप्त करने के लिए प्राप्त हुआ है और इस लक्ष्य को प्राप्त करने की सरलतम विधि है भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन। पिछले श्लोक में हमने इस विषय की कुछ सीमा तक व्याख्या की है और अब आगे हम पवित्र नाम के चरणों पर किये जानेवाले विभिन्न अपराधों पर प्रकाश डालेंगे। श्रील जीव गोस्वामी प्रभु ने प्रामाणिक शास्त्रों से अनेक उद्धरण दिये हैं और पवित्र नाम के चरणों पर किये जानेवाले अपराधों के विषय में व्यक्त विचारों की योग्यतापूर्वक पुष्टि की है। विष्णुयामल तन्त्र से, श्रील जीव गोस्वामी ने सिद्ध किया है कि भगवन्नाम के कीर्तन मात्र से मनुष्य सारे पापों के प्रभावों से मुक्त हो सकता है। मार्कण्डेय पुराण से उद्धरण देते हुए श्री गोस्वामी जी कहते हैं कि मनुष्य को चाहिए कि वह न तो भगवद्भक्त की निन्दा करे और न उन लोगों की बातें सुने, जो भगवद्भक्त को छोटा बताने का प्रयास करते रहते हैं। भक्त को चाहिए कि निन्दक की जीभ काटकर, उसे निन्दा करने से रोके और यदि ऐसा न कर सके तो उसे चाहिए कि भगवद्भक्त की निन्दा सुनने की अपेक्षा आत्मघात कर ले। निष्कर्ष यह है कि मनुष्य को न तो भगवद्भक्त की निन्दा सुननी चाहिए, न किसी को ऐसा करने देना चाहिए। जहाँ तक देवताओं के नामों से भगवान् के पवित्र नाम में अन्तर करने की बात है, शास्त्र (भगवद्गीता १०.४१) यह बताते हैं कि सारे असामान्य शक्तिशाली जीव परम शक्तिमान भगवान् कृष्ण के ही अंश हैं। स्वयं भगवान् के अतिरिक्त सभी उनके अधीन हैं, कोई भी भगवान् से स्वतन्त्र नहीं है। चूँकि कोई भी न तो भगवान् से अधिक शक्तिमान है या उनकी शक्ति के तुल्य है, अत: किसी का नाम भगवान् के नाम के समान शक्तिशाली नहीं हो सकता है। भगवान् के पवित्र नाम के कीर्तन मात्र से मनुष्य समस्त स्रोतों से एक ही समय घटित होनेवाली नियत शक्ति प्राप्त कर सकता है। अतएव भगवान् के परम पवित्र नाम की समता अन्य नाम से नहीं करनी चाहिए। ब्रह्मा, शिव या अन्य शक्तिशाली देवता कभी परम भगवान् विष्णु के समान नहीं हो सकते। भगवान् का शक्तिशाली पवित्र नाम निश्चित रूप से मनुष्य को पाप के प्रभावों से उबार सकता है, किन्तु जो व्यक्ति भगवान् के पवित्र नाम की दिव्य शक्ति का उपयोग अपने कुत्सित कार्यों के लिए करना चाहते हैं, वे संसार में सबसे पतित व्यक्ति होते हैं। ऐसे व्यक्तियों को भगवान् या उनके गण कभी भी क्षमा नहीं करते। अतएव मनुष्य को चाहिए कि सभी प्रकार से, बिना किसी अपराध के, अपने जीवन का उपयोग भगवान् के यशोगान में करे। जीवन के ऐसे कार्य की, भले ही वह एक क्षण का हो, तुलना अज्ञानमय दीर्घ जीवन से नहीं की जा सकती, जैसे वृक्ष या अन्य जीवों का दीर्घ जीवन जो किसी प्रकार की आध्यात्मिक प्रगति किये बिना हजारों वर्षों तक जीवित रह सकते हैं।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
About Us | Terms & Conditions
Privacy Policy | Refund Policy
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥