श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 1: ईश अनुभूति का प्रथम सोपान  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक
खट्‍वाङ्गो नाम राजर्षिर्ज्ञात्वेयत्तामिहायुष: ।
मुहूर्तात्सर्वमुत्सृज्य गतवानभयं हरिम् ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
खट्वाङ्ग:—राजा खट्वांग; नाम—नामक; राज-ऋषि:—ऋषितुल्य राजा; ज्ञात्वा—जानकर; इयत्ताम्—अवधि; इह—इस संसार में; आयुष:—अपने जीवन की; मुहूर्तात्—एक ही क्षण में; सर्वम्—सब कुछ; उत्सृज्य—छोडक़र; गतवान्—स्वीकार किया; अभयम्—पूरी तरह सुरक्षित; हरिम्—भगवान् को ।.
 
अनुवाद
 
 राजर्षि खट्वांग को जब यह सूचना दी गई कि उनकी आयु का केवल एक क्षण (मुहूर्त) शेष है, तो उन्होंने तुरन्त अपने आपको समस्त भौतिक कार्यकलापों से मुक्त करके परम रक्षक भगवान् की शरण ले ली।
 
तात्पर्य
 पुरी तरह से जिम्मेदार व्यक्ति को अपने वर्तमान मनुष्य-जीवन के मूल कर्तव्य का भान होना चाहिए। भौतिक जीवन की आसन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किया गया कर्म ही सब कुछ नहीं है। मनुष्य को अगले जीवन में श्रेष्ठतम पद प्राप्त करने के लिए अपने कर्तव्य के प्रति चौकन्ना रहना चाहिए। मनुष्य-जीवन हमें इसी मुख्य कर्तव्य की तैयारी करने के लिए मिला है। यहाँ पर महाराज खट्वांग का उल्लेख राजर्षि के रूप में हुआ है, क्योंकि वे अपने ऊपर राज्य-प्रबन्ध का उत्तरदायित्व होते हुए भी अपने जीवन के मुख्य कर्तव्य को भूले नहीं थे। यही हाल महाराज युधिष्ठिर तथा महाराज परीक्षित जैसे अन्य राजर्षियों का था। वे अपने मुख्य कर्तव्य को निभाने के प्रति जागरूक रहने के कारण आदर्श व्यक्ति थे। महाराज खट्वांग को देवताओं ने असुरों से युद्ध करने के लिए स्वर्ग में बुलाया था और राजा के रूप में उन्होंने देवताओं को पूरी तरह सन्तुष्ट करते हुए युद्ध किया। इस पर देवताओं ने प्रसन्न होकर उन्हें भौतिक भोग का कोई वर देना चाहा, लेकिन चूँकि महाराज खट्वांग अपने प्रमुख कर्तव्य के प्रति अत्यन्त जागरूक थे, अतएव उन्होंने देवताओं से अपने शेष जीवन के विषय में पूछा। इसका अर्थ यह है कि वे भौतिक वर प्राप्त करने के फेर में न थे, क्योंकि उन्हें अगले जीवन की तैयारी करनी थी। किन्तु देवताओं ने उन्हें बताया कि उनके जीवन का केवल एक क्षण शेष है, तो राजा ने तुरन्त उस स्वर्गधाम को छोड़ दिया, जो उच्चस्तरीय भौतिक भोग से पूरित है और पृथ्वी पर आकर उन्होंने परम रक्षक भगवान् की शरण ली। वे अपने महत्प्रयास में सफल रहे और उन्हें मुक्ति प्राप्त हुई। राजर्षि द्वारा यह प्रयास, यद्यपि एक क्षण के लिए था, किन्तु सफल रहा क्योंकि वे अपने मुख्य कर्तव्य के प्रति सदैव जागरूक रहे। इस तरह से महाराज परीक्षित महान् शुकदेव गोस्वामी द्वारा प्रोत्साहित हुए, यद्यपि उनके जीवन के सात ही दिन शेष थे, जिसमें उन्हें श्रीमद्भागवत के रूप में भगवान् की महिमा-श्रवण करने का मुख्य कर्तव्य सम्पन्न करना था। भगवान् की इच्छा से महाराज परीक्षित को तुरन्त शुकदेव गोस्वामी मिल गये और आध्यात्मिक सफलता का जो महान् कोष वे अपने पीछे छोड़ गये हैं, उसका उल्लेख श्रीमद्भागवत में सुन्दर ढंग से हुआ है।
 
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