श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 1: ईश अनुभूति का प्रथम सोपान  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक
तवाप्येतर्हि कौरव्य सप्ताहं जीवितावधि: ।
उपकल्पय तत्सर्वं तावद्यत्साम्परायिकम् ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
तव—तुम्हारा; अपि—भी; एतर्हि—अतएव; कौरव्य—हे कुरुवंशी; सप्ताहम्—सात दिन, हफ्ता; जीवित—आयु; अवधि:— सीमा; उपकल्पय—सम्पन्न करो; तत्—वे; सर्वम्—समस्त; तावत्—तब तक; यत्—जो है; साम्परायिकम्—अगले जीवन के लिए अनुष्ठान ।.
 
अनुवाद
 
 हे महाराज परीक्षित, अब आपकी आयु के और सात दिन शेष हैं। अतएव इस अवधि में आप उन समस्त अनुष्ठानों को सम्पन्न कर सकते हैं, जो आपके अगले जीवन के परम कल्याण के लिए आवश्यक हैं।
 
तात्पर्य
 महाराज खट्वांग जिन्होंने अत्यल्प समय में अपने अगले जीवन के लिए अपने आपको तैयार कर लिया था उनका उदाहरण प्रस्तुत करने के बाद शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित को यह कहकर प्रोत्साहित किया कि चूँकि उनके पास अब भी सात दिन शेष हैं, अतएव उन्हें अगले जीवन की तैयारी के लिए इस समय का सदुपयोग कर लेना चाहिए। एक तरह से गोस्वामीजी ने महाराज परीक्षित को बताया कि वे भगवान् के शब्द-रूप की शरण ग्रहण कर लें, क्योंकि उनके जीवन के अब भी सात दिन शेष हैं। इस प्रकार से वे मुक्त हो लें। दूसरे शब्दों में, शुकदेव गोस्वामी ने जिस तरह महाराज परीक्षित को श्रीमद्भागवत सुनाई थी, उसी रूप में उसका श्रवण करके प्रत्येक व्यक्ति अगले जीवन की अच्छी तरह तैयारी कर सकता है। ये अनुष्ठान औपचारिक नहीं हैं, अपितु कुछ अनुकूल बातें हैं जिनका पालन करना होता है और जिनका आदेश आगे दिया गया है।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥