श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 1: ईश अनुभूति का प्रथम सोपान  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक
गृहात् प्रव्रजितो धीर: पुण्यतीर्थजलाप्लुत: ।
शुचौ विविक्त आसीनो विधिवत्कल्पितासने ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
गृहात्—अपने घर से; प्रव्रजित:—बाहर जाकर; धीर:—आत्मसंयमी; पुण्य—पवित्र; तीर्थ—तीर्थ-स्थान; जल-आप्लुत:—पूरी तरह धोया हुआ; शुचौ—स्वच्छ किया; विविक्ते—एकान्त; आसीन:—बैठा हुआ; विधिवत्—नियमानुसार; कल्पित—सम्पन्न करके; आसने—आसन पर ।.
 
अनुवाद
 
 मनुष्य को घर छोड़ करके आत्मसंयम का अभ्यास करना चाहिए। उसे तीर्थस्थानों में नियमित रूप से स्नान करना चाहिए और ठीक से शुद्ध होकर एकान्त स्थान में आसन जमाना चाहिए।
 
तात्पर्य
 श्रेष्ठतर अगले जीवन की तैयारी के लिए मनुष्य को तथाकथित घर छोड़ देना चाहिए। वर्णाश्रम धर्म या सनातन धर्म की पद्धति कहती है कि पचास वर्ष की आयु पार कर लेने के बाद, जितनी जल्दी हो सके, पारिवारिक भार से वैराग्य ले लेना चाहिए। आधुनिक सभ्यता पारिवारिक सुविधाओं पर आधारित है, जिसे सुख-सुविधाओं का सर्वोच्च मानदण्ड माना जाता है। अतएव हर व्यक्ति, सेवा-निवृत्ति के बाद, ऐसे घर में रहना चाहता है, जो सुन्दर स्त्रियों तथा बच्चों से अलंकृत हो। वह ऐसे सुविधापूर्ण घर से बाहर जाने की रंचमात्र इच्छा नहीं करता। उच्च सरकारी अफसर तथा मन्त्री, मृत्यु के समय तक, अपने उपहार-रुपी पदों पर चिपके रहते हैं और वे इन घेरलू सुविधाओं से बाहर निकलने का स्वप्न में भी विचार नहीं करते। ऐसे व्यामोह से बँधकर, भौतिकतावादी व्यक्ति इससे भी अधिक सुखी जीवन की विविध योजनाएँ तैयार करते हैं। किन्तु क्रूर मृत्यु सहसा बड़े से बड़े योजना- कारोंं को, उसकी इच्छा के विरुद्ध, उठा लेती है और इस शरीर को त्याग कर दूसरा शरीर धारण करने के लिए बाध्य कर देती है। इस तरह ऐसे योजनाकार को अपने किये गये पूर्व कर्मों के अनुसार ८४,००,००० जीव योनियों में से कोई एक शरीर ग्रहण करने के लिए बाध्य किया जाता है। जो लोग पारिवारिक सुविधाओं के प्रति अधिक आसक्त होते हैं, उन्हें अगले जीवन में इस पापमय लम्बी आयु में किये गये पाप-कर्मों के कारण निम्न योनि प्रदान की जाती है। इस तरह मानव-जीवन की सारी शक्ति नष्ट हो जाती है। मनुष्य-जीवन को इस तरह बर्बाद होने और काल्पनिक वस्तुओं में लिप्त रहने से बचाने के लिए मनुष्य को यदि पहले नहीं तो कम से कम पचास वर्ष की आयु में सावधान हो जाना चाहिए। सिद्धान्त यह है कि मनुष्य इसे मान ले कि मृत्यु की खतरे की घंटी पचास वर्ष की आयु पूरी करने के पहले ही बज जाती है, अतएव हर हालत में उसे श्रेष्ठतर भावी जीवन के लिए तैयारी करनी चाहिए। सनातन धर्म संस्था की पद्धति ऐसी बनाई गई है कि इसका पालन करने वाला अगले जीवन के विनष्ट होने की किसी प्रकार
की सम्भावना के बिना श्रेष्ठतर अगले जीवन के लिए प्रशिक्षित हो जाए। संसार भर में पवित्र स्थल (तीर्थस्थल) उन सेवानिवृत्त व्यक्तियों के आवास के लिए हैं, जो श्रेष्ठतर अगले जीवन की तैयारी करने में लगे रहते हैं। इसीलिए बुद्धिमान मनुष्यों को जीवन के अन्त में, पचास वर्ष की आयु के पश्चात्, जीवन में बन्धनस्वरूप पारिवारिक आसक्ति से मुक्त होने के लिए आध्यात्मिक कायाकल्प का जीवन बिताने के उद्देश्य से तीर्थों में जाना चाहिए। मनुष्य को भौतिक आसक्ति से छुटकारा पाने के लिए गृह-त्याग करने की संस्तुति की जाती है, क्योंकि जो व्यक्ति मृत्यु तक पारिवारिक जीवन से चिपका रहता है, वह भौतिक आसक्ति को त्याग नहीं सकता और जब तक वह भौतिक आसक्ति को नहीं छोड़ता, तब तक वह आध्यात्मिक स्वतन्त्रता को नहीं समझ पाता। लेकिन उसे गृहत्याग करके या तीर्थ स्थान में वैध या अवैध रूप से दूसरा घर बनाकर आत्म-सन्तुष्ट नहीं हो जाना चाहिए। ऐसे अनेक लोग हैं, जो घर छोडक़र ऐसे तीर्थस्थानों में जाते हैं, किन्तु विपरीत लिंगी कुसंगति में पडक़र पुन: गृहस्थ बन जाते हैं। माया की मोहिनी शक्ति इतनी प्रबल है कि जीवन की प्रत्येक अवस्था में, यहाँ तक कि अपने सुखी घर का त्याग करने के बाद भी, मनुष्य ऐसे मोह में पड़ सकता है। अतएव यह अनिवार्य है कि मनुष्य ब्रह्मचर्य द्वारा यौन-लिप्सा से रहित होकर आत्मसंयम का अभ्यास करे। जो व्यक्ति जीवन सुधारना चाहता है, उसके लिए यौन-लिप्सा आत्मघात या उससे भी बढक़र है। अतएव पारिवारिक जीवन से पृथक् रहने का अर्थ है समस्त इन्द्रिय इच्छाओं पर और विशेष रूप से यौन-इच्छा पर, संयम रखना। इसकी विधि यह है कि मनुष्य को कुश, मृगचर्म तथा दरी का पवित्र आसन तैयार करना चाहिए और उस पर बैठकर उपर्युक्त विधि से निरपराध भाव से भगवान् के पवित्र नाम का जप करना चाहिए। यह समूची विधि मन को भौतिक कार्यों से खींचकर भगवान् के चरणकमलों में स्थिर करने के निमित्त है। यह सरल विधि ही सर्वोच्च अध्यात्मिक सफलता दिलाने में सहायक होगी।
 
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥