श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 1: ईश अनुभूति का प्रथम सोपान  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक
तत्रैकावयवं ध्यायेदव्युच्छिन्नेन चेतसा ।
मनो निर्विषयं युक्त्वा तत: किञ्चन न स्मरेत् ।
पदं तत्परमं विष्णोर्मनो यत्र प्रसीदति ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
तत्र—तत्पश्चात्; एक—एक-एक करके; अवयवम्—शरीर के अंगों को; ध्यायेत्—ध्यान करे; अव्युच्छिन्नेन—पूर्णस्वरूप से विचलित हुए बिना; चेतसा—मन से; मन:—मन; निर्विषयम्—विषयों से दूषित हुए बिना; युक्त्वा—जुड़ कर के; तत:— तत्पश्चात्; किञ्चन—कुछ भी; न—नहीं; स्मरेत्—सोचे; पदम्—व्यक्तित्व को; तत्—वह; परमम्—परम; विष्णो:—विष्णु का; मन:—मन; यत्र—जहाँ; प्रसीदति—प्रसन्न होता है, रमता है ।.
 
अनुवाद
 
 तत्पश्चात्, श्रीविष्णु के पूर्ण शरीर की अव-धारणा को हटाये बिना, एक-एक करके विष्णु के अंगों का ध्यान करना चाहिए। इस तरह मन समस्त इन्द्रिय-विषयों से मुक्त हो जाता है। तब चिन्तन के लिए कोई अन्य वस्तु नहीं रह जानी चाहिए। चूँकि भगवान् विष्णु परम सत्य हैं, अतएव केवल उन्हीं में मन पूर्ण रूप से रम जाता है।
 
तात्पर्य
 विष्णु की बहिरंगा शक्ति से मोहित होकर मूर्ख लोग यह नहीं जान पाते कि सुख की लगातार खोज का चरम लक्ष्य भगवान् विष्णु का सान्निध्य प्राप्त करना है। विष्णुतत्त्व भगवान् के विभिन्न दिव्य स्वरूपों का असीम विस्तार है और विष्णुतत्त्व का परम या आदि स्वरूप, गोविन्द अथवा कृष्ण हैं, जो समस्त कारणों के कारण हैं। अतएव विष्णु का चिन्तन या विष्णु के दिव्य रूप का, विशेष रूप से कृष्ण का, ध्यान करना ध्यान की चरम सीमा है। यह ध्यान भगवान् के चरणकमल से शुरू किया जा सकता है। लेकिन मनुष्य को भगवान् के पूर्ण स्वरूप को नहीं भूलना चाहिए। इस तरह उसे एक-एक करके, उनके दिव्य शरीर के सभी अंगों के चिन्तन का अभ्यास करना चाहिए। इस श्लोक में यह निश्चित रूप से आश्वस्त किया गया है कि परब्रह्म निर्विशेष नहीं हैं। वे व्यक्ति तो हैं, किन्तु उनका शरीर हम-जैसे बद्धजीवों से भिन्न है। अन्यथा पूर्ण आध्यात्मिक सिद्धि की प्राप्ति के लिए शुकदेव गोस्वामी ने प्रणव (ॐकार) से लेकर विष्णु के साकार शरीर के अंग-प्रत्यंग के ध्यान की संस्तुति न की होती। भारत के भव्य मन्दिरों में श्रीविष्णु-विग्रहों की पूजा मूर्तिपूजा नहीं है जैसाकि कुछ अल्पज्ञ लोग गलत अर्थ निकालते हैं, बल्कि ये मन्दिर श्रीविष्णु के दिव्य अंगों पर ध्यान लगाने के आध्यात्मिक केन्द्र हैं। श्रीविष्णु के मन्दिरों में भगवान् की अचिन्त्य शक्ति के कारण भगवान् का पूजनीय विग्रह भगवान् से अभिन्न है। जैसा श्रीशुकदेव गोस्वामी ने, जो एक महान् अधिकारी हैं, अनुशंसा की है, कि जो व्यक्ति एक स्थान पर बैठकर प्रणव (ॐकार) का या विष्णु के अंगों का ध्यान नहीं कर सकते, उनके लिए मन्दिर में विष्णु के दिव्य अंगों का शास्त्र-रीति के अनुसार ध्यान करना, ध्यान का एक सुलभ अवसर है। जन-सामान्य को अ-उ-म् इन तीनों अक्षरों के दिव्य मेल से बने ॐकार की अपेक्षा मन्दिर में विष्णु के रूप का ध्यान करने से अधिक लाभ प्राप्त हो सकता है। यद्यपि ॐकार तथा विष्णु के रूपों में कोई अन्तर नहीं है, किन्तु जो लोग परम सत्य के विज्ञान से अवगत नहीं होते, वे विष्णु के रूपों तथा ॐकार में अन्तर बताकर मतभेद उत्पन्न करने का प्रयास करते हैं। यहाँ यह संकेत दिया गया है कि विष्णु-रूप ही ध्यान का चरम लक्ष्य है। अतएव निर्विशेष ॐकार की अपेक्षा विष्णु के रूपों पर चित्त को एकाग्र करना श्रेयस्कर है। इनमें से पहली विधि दूसरे की अपेक्षा अधिक कठिन भी है।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
About Us | Terms & Conditions
Privacy Policy | Refund Policy
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥