श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 1: ईश अनुभूति का प्रथम सोपान  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक
श्रोतव्यादीनि राजेन्द्र नृणां सन्ति सहस्रश: ।
अपश्यतामात्मतत्त्वं गृहेषु गृहमेधिनाम् ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
श्रोतव्य-आदीनि—श्रवण योग्य विषयों में; राजेन्द्र—हे सम्राट; नृणाम्—मानव समाज का; सन्ति—हैं; सहस्रश:—सैकड़ों तथा हजारों; अपश्यताम्—अंधे का; आत्म-तत्त्वम्—आत्म-ज्ञान, परम सत्य; गृहेषु—घर में; गृह-मेधिनाम्—भौतिकता में फँसे व्यक्तियों का ।.
 
अनुवाद
 
 हे सम्राट, भौतिकता में उलझे उन व्यक्तियों के पास जो परम सत्य विषयक ज्ञान के प्रति अंधे हैं, मानव समाज में सुनने के लिए अनेक विषय होते हैं।
 
तात्पर्य
 शास्त्रों में पारिवारिक जीवन के लिए दो नाम हैं—एक गृहस्थ और दूसरा गृहमेधी। गृहस्थ वे हैं, जो अपनी पत्नी तथा बच्चों के साथ-साथ रहते हैं, लेकिन परम सत्य की अनुभूति के लिए आध्यात्मिक जीवन बिताते हैं। किन्तु गृहमेधी वे हैं, जो केवल पारिवारिक सदस्यों के लाभ के लिए जीवित रहते हैं, चाहे संयुक्त परिवार में रहें या छोटे परिवार में रहें और वे अन्यों से ईर्ष्या करते हैं। मेधी शब्द अन्यों से ईर्ष्या का सूचक है। गृहमेधी केवल पारिवारिक मामलों में रुचि रखने के कारण, निश्चित रूप से, अन्यों के प्रति ईर्ष्यालु रहते हैं। अतएव एक गृहमेधी का दूसरे गृहमेधी से अच्छा सम्बन्ध नहीं रहता और व्यापक रूप में एक जाति, समाज या राष्ट्र स्वार्थी रुचि के कारण अन्य जाति, समाज या राष्ट्र से अच्छे सम्बन्ध नहीं रखते। इस कलियुग में सारे गृहस्थ एक दूसरे से ईर्ष्या करते हैं, क्योंकि वे परम सत्य के ज्ञान के प्रति अन्धे हैं। उनके पास सुनने के लिए अनेक प्रकार के विषय हैं यथा राजनीतिक, वैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक आदि लेकिन अल्पज्ञान के कारण वे जीवन के घोर कष्टों—जन्म, मृत्यु, जरा तथा व्याधि के दुखों की परवाह नहीं करते। वास्तव में मनुष्य जीवन तो जन्म, मृत्यु, जरा तथा व्याधि का अन्तिम हल खोज निकालने के लिए है, लेकिन भौतिक प्रकृति के द्वारा मोहग्रस्त होने के कारण गृहमेधी आत्म-साक्षात्कार के विषय में सब कुछ भूल जाते हैं। जीवन की समस्याओं का अन्तिम हल तो भगवद्धाम को वापस जाना है और जैसाकि भगवद्गीता (८.१६) में कहा गया है, वहाँ जगत के सारे क्लेश यथा जन्म, मृत्यु, जरा तथा व्याधि दूर हो जाते हैं।

भगवद्धाम वापस जाने की विधि है भगवान् तथा उनके नाम, रूप, गुण, लीलाओं, साज-सामान तथा विविधता के विषय में श्रवण करना। मूर्ख लोग इसे नहीं जानते। वे तो प्रत्येक नाशवान वस्तु के नाम, रूप आदि के विषय में कुछ न कुछ सुनना चाहते हैं और वे यह नहीं जानते कि सुनने की इस प्रवृत्ति का सदुपयोग परम कल्याण के लिए किस तरह किया जाय। वे भ्रांत तो रहते ही हैं, अतएव वे परम सत्य के नाम, रूप, गुणों आदि के विषयों में कुछ मिथ्या-साहित्य भी तैयार कर लेते हैं। अतएव मनुष्य को चाहिए कि वह केवल अन्यों से ईर्ष्या करने के लिए गृहमेधी न बने; उसे शास्त्रों के आदेशानुसार असली गृहस्थ बनना चाहिए।

 
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