श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 1: ईश अनुभूति का प्रथम सोपान  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक
रजस्तमोभ्यामाक्षिप्तं विमूढं मन आत्मन: ।
यच्छेद्धारणया धीरो हन्ति या तत्कृतं मलम् ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
रज:—रजोगुण; तमोभ्याम्—तथा तमोगुण के द्वारा; आक्षिप्तम्—उद्वेलित; विमूढम्—मोहग्रस्त; मन:—मन; आत्मन:—अपना; यच्छेत्—सुधार ले; धारणया—(विष्णु की) धारणा से; धीर:—शान्त; हन्ति—नष्ट करता है; या—वे सब; तत्-कृतम्—उनके द्वारा की गई; मलम्—गंदी वस्तुओं को ।.
 
अनुवाद
 
 मनुष्य का मन सदैव रजोगुण द्वारा विचलित और तमोगुण द्वारा मोहग्रस्त होता रहता है। किन्तु मनुष्य ऐसी धारणाओं को भगवान् विष्णु के सम्बन्ध द्वारा ठीक कर सकता है और इस तरह उनसे उत्पन्न गंदी वस्तुओं को स्वच्छ करके शान्त बन सकता है।
 
तात्पर्य
 जो लोग सामान्यतया रजो तथा तमोगुणों द्वारा संचालित होते है, वे ईश्वरीय अनुभूति की दिव्य अवस्था प्राप्त करने के प्रामाणिक पात्र नहीं होते। सतोगुण द्वारा संचालित व्यक्ति ही परम सत्य के ज्ञान को प्राप्त कर सकते हैं। रजो तथा तमोगुण के प्रभाव कांचन तथा कामिनी के प्रति अत्यधिक लालसा के कारण प्रकट होते हैं। और जो लोग कांचन एवं कामिनी के पीछे पड़े रहते है वे अपनी मनोवृत्तियों को भगवान् विष्णु के शक्तिशाली निराकार स्वरूप का निरन्तर स्मरण करके सुधार सकते हैं। सामान्यतया निर्विशेषवादी या अद्वैतवादी ही रजो तथा तमोगुण से प्रभावित होते हैं। ऐसे निर्विशेषवादी अपने को मुक्तात्मा समझते हैं, किन्तु वे परम सत्य के दिव्य साकार-स्वरूप के विषय में कुछ भी नहीं जानते। वस्तुत: ब्रह्म के साकार-स्वरूप विषयक ज्ञान से रहित होने के कारण उनका अन्त:करण अशुद्ध रहता है। भगवद्गीता में कहा गया है कि सैकड़ों जन्मों के बाद, निर्विशेष चिन्तक भगवान् की शरण ग्रहण करता है। भगवान् के साकार-स्वरूप का साक्षात्कार करने की योग्यता प्राप्त करने के लिए, नवदीक्षित निर्विशेषवादी को ब्रह्मवाद के दर्शन द्वारा प्रत्येक वस्तु के साथ भगवान् के सम्बन्ध की अनुभूति करने का अवसर प्रदान किया जाता है।

अपनी उच्चतर अवस्था में ब्रह्मवाद किसी भी साधक को परम सत्य की निर्विशेष धारणा बनाने की अनुमति नहीं देता, अपितु यह परम सत्य की धारणा को तथाकथित भौतिक शक्ति के क्षेत्र तक विस्तारित करता है। भौतिक शक्ति द्वारा सृजित सारी वस्तुओं को सेवाभाव द्वारा ब्रह्म के साथ जोड़ा जा सकता है, जो जीवन शक्ति का अनिवार्य अंग है। भगवान् का शुद्ध भक्त, अपने इस सेवाभाव से प्रत्येक वस्तु को आध्यात्मिक सत्ता में बदलने की कला से अवगत होता है और इसी भक्तिमय विधि से ब्रह्मवाद के सिद्धान्त को पूर्णता प्रदान की जा सकती है।

 
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