श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 1: ईश अनुभूति का प्रथम सोपान  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक
राजोवाच
यथा सन्धार्यते ब्रह्मन् धारणा यत्र सम्मता ।
याद‍ृशी वा हरेदाशु पुरुषस्य मनोमलम् ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
राजा उवाच—सौभाग्यशाली राजा ने कहा; यथा—जिस तरह; सन्धार्यते—धारणा बनाई जाती है; ब्रह्मन्—हे ब्राह्मण; धारणा—धारणा; यत्र—जहाँ तथा जैसे; सम्मता—संक्षेप में; यादृशी—जैसी; वा—अथवा; हरेत्—समूल नष्ट करता है; आशु—विलम्ब किये बिना; पुरुषस्य—व्यक्ति के; मन:—मन के; मलम्—मल को ।.
 
अनुवाद
 
 सौभाग्यशाली राजा परीक्षित ने आगे पूछा : हे ब्राह्मण, कृपा करके विस्तार से यह बतायें कि मन को कहाँ और कैसे लगाया जाये? और धारणा को किस तरह स्थिर किया जाय कि मनुष्य के मन का सारा मैल हटाया जा सके?
 
तात्पर्य
 बद्धजीव के हृदय की सारी मलिनता ही उसके सारे कष्टों की जड़ है। बद्धजीव संसार के अनेक कष्टों से घिरा है, किन्तु अपने निपट अज्ञान के कारण वह इस भौतिक जगत में अपने दीर्घ बन्दी जीवन की अवधि में हृदय में संचित गंदगी (मल) को दूर करने में असमर्थ रहता है। वास्तव में वह परमेश्वर की इच्छानुसार सेवा करने के निमित्त आया होता है, किन्तु हृदय की गंदगी के कारण वह अपनी मनोकल्पित इच्छाओं की पूर्ति करना चाहता है। ये इच्छाएँ उसे मन:शान्ति प्रदान करने के बजाय नई-नई समस्याएँ उत्पन्न करती रहती हैं और इस तरह उसे जन्म-मृत्यु के चक्र से बाँध देती हैं। सकाम कर्म तथा ज्ञान का यह मल परमेश्वर की संगति करके ही दूर किया जा सकता है। सर्वशक्तिमान होने के कारण भगवान् अपनी अचिन्त्य शक्तियों के द्वारा अपना सान्निध्य प्रदान कर सकते हैं। अतएव जो लोग ब्रह्म के साकार स्वरूप में श्रद्धा दृढ़ नहीं कर पाते, उन्हें भगवान् के विराट रूप का सान्निध्य प्राप्त करने का अवसर प्रदान किया जाता है। भगवान् का विराट निर्विशेष स्वरूप उनकी असीम शक्तियों का स्वरूप है। चूँकि शक्तिमान तथा शक्ति अभिन्न हैं, अतएव उनके विराट स्वरूप की निर्विशेष धारणा भी बद्धजीव को अप्रत्यक्ष रूप से भगवान् का सान्निध्य प्राप्त करने में सहायक होती है और इस तरह क्रमश: साकार सम्पर्क की अवस्था प्राप्त की जा सकती है।

महाराज परीक्षित पहले से भगवान् श्रीकृष्ण के साकार स्वरूप से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े थे। अतएव उन्हें शुकदेव गोस्वामी से यह पूछने की आवश्यकता नहीं थी कि मन को कहाँ और कैसे ब्रह्म के निर्विशेष विराट रूप में लगाया जाय। किन्तु उन्होंने उन सबके लाभ के लिए इस विषय में विशद जिज्ञासा की, जो भगवान् के सच्चिदानन्द स्वरूप के दिव्य साकार स्वरूप की कल्पना करने में असमर्थ हैं। अभक्त लोग भगवान् के साकार स्वरूप के विषय में सोच भी नहीं सकते। उनके अल्पज्ञान के कारण, राम या कृष्ण के साकार स्वरूप उनके लिए नितान्त क्रान्तिकारी हैं। उन्हें भगवान् की शक्ति का बहुत ही कम अनुमान होता है। भगवद्गीता (९.११) में स्वयं भगवान् ने यह बताया है कि अल्पज्ञ पुरुष, भगवान् को सामान्य व्यक्ति मानकर, उपहास करते हैं। ऐसे व्यक्ति भगवान् की अचिन्त्य शक्ति से अनजान रहते हैं। भगवान् अपनी अचिन्त्य शक्ति से, मानव-समाज में या जीवों के अन्य समाज में विचरण करते हुए भी अपने दिव्य पद से रंचमात्र हटे बिना वही सर्वशक्तिमान भगवान् बने रहते हैं। अतएव ऐसे व्यक्तियों के लाभ के लिए, जो भगवान् के साकार दिव्य स्वरूप को स्वीकार करने में असमर्थ हैं, महाराज परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से पूछा कि प्रारम्भ में मन को भगवान् पर किस तरह स्थिर किया जाय और गोस्वामीजी ने निम्नवत् उसका विस्तार से उत्तर दिया।

 
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