श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 1: ईश अनुभूति का प्रथम सोपान  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
जितासनो जितश्वासो जितसङ्गो जितेन्द्रिय: ।
स्थूले भगवतो रूपे मन: सन्धारयेद्धिया ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—शुकदेव गोस्वामी ने कहा; जित-आसन:—संयमित आसन; जित-श्वास:—संयमित श्वास-क्रिया; जित सङ्ग:—संयमित संगति; जित-इन्द्रिय:—संयमित इन्द्रियाँ; स्थूले—स्थूल पदार्थ में; भगवत:—भगवान् के; रूपे—स्वरूप में; मन:—मन को; सन्धारयेत्—लगाए; धिया—बुद्धि से ।.
 
अनुवाद
 
 शुकदेव गोस्वामी ने उत्तर दिया : मनुष्य को चाहिए कि आसन को नियन्त्रित करे, यौगिक प्राणायाम द्वारा श्वास-क्रिया को नियमित करे और इस तरह मन तथा इन्द्रियों को वश में करे। फिर बुद्धिपूर्वक मन को भगवान् की स्थूल शक्तियों (विराट रूप) में लगाये।
 
तात्पर्य
 भौतिकता में निमग्न बद्धजीव का मन उसे देहात्मबुद्धि से ऊपर उठने नहीं देता, अतएव निपट भौतिकतावादी के चरित्र को ढालने के लिए ध्यान के योग-पद्धति (आसन और श्वास प्रक्रिया को नियंत्रित करने तथा मन को परमेश्वर में स्थिर करने) की संस्तुति की गई है। जब तक ऐसे भौतिकतावादी लोग भौतिकता में निमग्न मन को स्वच्छ नहीं बना लेते, तब तक उनके लिए आध्यात्मिक विचारों में मन को एकाग्र कर पाना असम्भव है। ऐसा करने के लिए अपने मन को भगवान् के स्थूल भौतिक या बाह्य स्वरूप में एकाग्र करना चाहिए। अगले श्लोक में भगवान् के विराट रूप के विभिन्न भागों का वर्णन किया गया है। भौतिकतावादी व्यक्ति ऐसी नियमन-विधि के फलस्वरूप कुछ योग शक्तियाँ प्राप्त करने के लिए उत्सुक रहते हैं, लेकिन यौगिक अनुष्ठानों का असली प्रयोजन संचित मल को—यथा वासना, क्रोध, ईर्ष्या तथा अन्य भौतिक कल्मषों को—दूर करना है। यदि योगी चमत्कारिक आसनों के प्रदर्शन में पड़ जाता है, तो उसकी यौगिक सफलता का लक्ष्य विफल हो जाता है, क्योंकि उसका परम ध्येय तो ईश-साक्षात्कार है। अतएव उसे भिन्न धारणा के द्वारा, अपने स्थूल भौतिकतावादी मन को स्थिर करने और इस तरह भगवान् की शक्ति की अनुभूति करने की संस्तुति की जाती है। ज्योंही ये शक्तियाँ अध्यात्म (योग) की नैमित्तिक अभिव्यक्तियाँ प्रतीत होने लगती हैं, तो वह स्वत: आगे बढ़ जाता है और क्रमश: उसके लिए पूर्ण अनुभूति की अवस्था प्राप्त कर पाना सम्भव हो जाता है।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
About Us | Terms & Conditions
Privacy Policy | Refund Policy
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥