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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 1: ईश अनुभूति का प्रथम सोपान  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  2.1.30 
द्यौरक्षिणी चक्षुरभूत्पतङ्ग:
पक्ष्माणि विष्णोरहनी उभे च ।
तद्भ्रूविजृम्भ: परमेष्ठिधिष्ण्य-
मापोऽस्य तालु रस एव जिह्वा ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
द्यौ:—अन्तरिक्ष; अक्षिणी—नेत्र-गोलक; चक्षु:—आँखों के; अभूत्—ऐसा हुआ; पतङ्ग:—सूर्य; पक्ष्माणि—पलकें; विष्णो:— भगवान् श्री विष्णु की; अहनी—दिन तथा रात; उभे—दोनों; —तथा; तत्—उसका; भ्रू—भौहें; विजृम्भ:—गतियाँ; परमेष्ठि—सर्वोपरि जीव (ब्रह्मा); धिष्ण्यम्—पद; आप:—वरुण, जल का स्वामी; अस्य—उसका; तालू—तालू; रस:—रस; एव—निश्चय ही; जिह्वा—जीभ ।.
 
अनुवाद
 
 बाह्य अन्तरिक्ष उसकी आँखों के गड्ढे हैं तथा देखने की शक्ति के लिए सूर्य नेत्र-गोलक हैं। दिन तथा रात पलकें हैं और उसकी भृकुटि की गतियों में ब्रह्मा तथा अन्य महापुरुषों का निवास होता है। जल का अधीश्वर वरुण उसका तालु तथा सभी वस्तुओं का रस या सार उसकी जीभ है।
 
तात्पर्य
 सामान्य ज्ञान के अनुसार इस श्लोक का वर्णन विरोधाभाषी प्रतीत होता है, क्योंकि सूर्य को कभी नेत्र-गोलक कहा गया है, तो कभी बाह्य अन्तरिक्ष। लेकिन शास्त्रों के आदेश में सामान्य ज्ञान का स्थान नहीं होता। हमें इन आदेशों को स्वीकार करना चाहिए और सामान्य ज्ञान पर केन्द्रित न रहकर विराट रूप में एकाग्र चित्त होना चाहिए। सामान्य ज्ञान सदैव अधूरा होता है, जबकि शास्त्रों का वर्णन सदा पूर्ण होता है। यदि कोई दोष होता है, तो वह हमारी अपूर्णता के कारण होता है, शास्त्रों के कारण नहीं। वैदिक ज्ञान प्राप्त करने की यही विधि है।
 
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