श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 1: ईश अनुभूति का प्रथम सोपान  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक
व्रीडोत्तरौष्ठोऽधर एव लोभो
धर्म: स्तनोऽधर्मपथोऽस्य पृष्ठम् ।
कस्तस्य मेढ्रं वृषणौ च मित्रौ
कुक्षि: समुद्रा गिरयोऽस्थिसङ्घा: ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
व्रीड—लज्जा; उत्तर—ऊपरी; ओष्ठ:—होंठ; अधर:—ठुड्डी; एव—निश्चय ही; लोभ:—लालसा; धर्म:—धर्म; स्तन:— वक्षस्थल; अधर्म—अधर्म; पथ:—मार्ग; अस्य—उसका; पृष्ठम्—पीठ; क:—ब्रह्मा; तस्य—उसकी; मेढ्रम्—जननेन्द्रिय; वृषणौ—अण्डकोश; च—भी; मित्रौ—मित्रावरुण; कुक्षि:—कमर, कोख; समुद्रा:—समुद्र; गिरय:—पर्वत; अस्थि—हड्डियाँ; सङ्घा:—समूह ।.
 
अनुवाद
 
 लज्जा भगवान् का ऊपरी होठ है, लालसा उनकी ठुड्डी है, धर्म उनका वक्ष:स्थल तथा अधर्म उनकी पीठ है। भौतिक जगत में समस्त जीवों के जनक ब्रह्मा जी उनकी जननेन्द्रिय (लिंग) हैं और मित्रा-वरुण उनके दोनों अण्डकोश हैं। सागर उनकी कमर है और पर्वत उनकी अस्थियों के समूह हैं।
 
तात्पर्य
 परमेश्वर निर्विशेष नहीं हैं, जैसाकि अल्पज्ञ विचारक सोचा करते हैं। प्रत्युत वे परम पुरुष हैं, जिसकी पुष्टि समस्त प्रामाणिक वैदिक ग्रन्थों द्वारा होती है। लेकिन उनका व्यक्तित्व वैसा नहीं है जैसा हम अनुमान लगा सकते हैं। यहाँ पर यह कहा गया है कि ब्रह्माजी उनकी जननेन्द्रियों का कार्य करते हैं तथा मित्रावरुण उनके दो अण्डकोश हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि पुरुष के रूप में वे समस्त शारीरिक अवयवों से पूर्ण हैं, लेकिन वे भिन्न प्रकार के तथा विभिन्न शक्तियों वाले हैं। अतएव जब भगवान् को निर्विशेष रूप में वर्णित किया जाता है, तो यह समझना चाहिए कि उनका स्वरूप हमारी अपूर्ण कल्पना के ही समरूप नहीं है। किन्तु मनुष्य चाहे तो पर्वतों या समुद्रों तथा आकाश को विराट पुरुष का अंश मानकर उनकी पूजा कर सकता है। भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को जो विराट रूप प्रदर्शित किया, वह आस्थाहीनों के लिए एक चुनौती है।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥