श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 1: ईश अनुभूति का प्रथम सोपान  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक
नद्योऽस्य नाड्योऽथ तनूरुहाणि
महीरुहा विश्वतनोर्नृपेन्द्र ।
अनन्तवीर्य: श्वसितं मातरिश्वा
गतिर्वय: कर्म गुणप्रवाह: ॥ ३३ ॥
 
शब्दार्थ
नद्य:—नदियाँ; अस्य—उसकी; नाड्य:—नाडियाँ, नसें; अथ—तत्पश्चात्; तनू-रुहाणि—शरीर के बाल; मही-रुहा:—पेड़ पौधे; विश्व-तनो:—विश्व-रूप का; नृप-इन्द्र—हे राजा; अनन्त-वीर्य:—सर्व-शक्तिमान; श्वसितम्—श्वास-क्रिया; मातरिश्वा— वायु; गति:—गति; वय:—व्यतीत होती आयु; कर्म—कर्म; गुण-प्रवाह:—प्रकृति के गुणों की प्रतिक्रियाएँ ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजन्, नदियाँ उस विराट शरीर की नसें हैं, वृक्ष रोम हैं और सर्वशक्तिमान वायु उनकी श्वास है। व्यतीत होते हुए युग उनकी गति तथा प्रकृति के तीनों गुणों की प्रतिक्रियाएँ ही उनके कार्यकलाप हैं।
 
तात्पर्य
 भगवान् न तो जड़ पत्थर हैं, न ही निष्क्रिय हैं, जैसाकि कुछ विचारधारा वाले हैं। वे समय के साथ गतिशील हैं, अतएव वे अपने वर्तमान कार्यकलापों के साथ-साथ भूत तथा भविष्य के विषय में भी सब कुछ जानते हैं। उनसे कुछ भी अनजान नहीं रहता है। बद्धजीव प्रकृति के गुणों की प्रतिक्रियाओं द्वारा इधर-उधर मारे-मारे फिरते हैं और ये ही भगवान् के कार्यकलाप हैं। जैसाकि भगवद्गीता (७.१२) में कहा गया है, प्रकृति के गुण उन्हीं की निर्देशन में कार्य करते हैं, अतएव कोई भी प्राकृतिक कार्य न तो निरुद्देश्य होता है, न ही स्वचालित। सारे कार्यकलापों के पीछे भगवान् की अध्यक्षता की शक्ति कार्य करती है। इस तरह भगवान् कभी निष्क्रिय नहीं होते, जैसाकि भ्रमवश सोचा जाता है। वेदों का कथन है कि परमेश्वर को स्वयं कुछ नहीं करना पड़ता, जैसाकि श्रेष्ठजनों के साथ होता है, लेकिन सृष्टि के सारे कार्य उन्हीं की अध्यक्षता में सम्पन्न होते हैं। जैसा कहा जाता है कि उनकी स्वीकृति के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता। ब्रह्म-संहिता (५.४८) में कहा गया है कि सारे ब्रह्माण्ड तथा इनके अधीश्वर (ब्रह्मा), उनके श्वास लेने की अवधि तक ही बने रहते हैं। यहाँ पर इसी की पुष्टि की गई है। ब्रह्माण्डों के भीतर जिस वायु में सारे ब्रह्माण्ड तथा लोक स्थित हैं, वह अतर्क्य विराट पुरुष की श्वास का अंश मात्र है। अतएव मनुष्य नदियों, वृक्षों, वायु तथा बीतने वाले युगों के अध्ययन द्वारा भी भगवान् की निर्विशेष धारणा से दिग्भ्रमित न होकर भगवान् की सही धारणा बना सकता है। भगवद्गीता (१२.५) में कहा गया है कि जो परम सत्य के निर्विशेष रूप के प्रति आकृष्ट हैं, वे भगवान् के सगुण स्वरूप के उपासकों की अपेक्षा अधिक कष्ट उठाते हैं।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥