श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 1: ईश अनुभूति का प्रथम सोपान  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक
ईशस्य केशान् विदुरम्बुवाहान्
वासस्तु सन्ध्यां कुरुवर्य भूम्न: ।
अव्यक्तमाहुर्हृदयं मनश्च
स चन्द्रमा: सर्वविकारकोश: ॥ ३४ ॥
 
शब्दार्थ
ईशस्य—परम नियन्ता के; केशान्—सिर के बाल; विदु:—तुम मुझसे जान लो; अम्बु-वाहान्—जल ले जाने वाले बादल; वास: तु—वस्त्र; सन्ध्याम्—दिन तथा रात्रि का सन्धि-काल; कुरु-वर्य—हे कुरुओं में श्रेष्ठ; भूम्न:—सर्वशक्तिमान का; अव्यक्तम्—भौतिक सृष्टि का आदि कारण; आहु:—कहा जाता है; हृदयम्—बुद्धि; मन: च—तथा मन; स:—वह; चन्द्रमा:— चन्द्रमा; सर्व-विकार-कोश:—समस्त परिर्वतनों का आगार ।.
 
अनुवाद
 
 हे कुरुश्रेष्ठ, जल ले जानेवाले बादल उनके सिर के बाल हैं, दिन या रात्रि की सन्धियाँ ही उनके वस्त्र हैं तथा भौतिक सृष्टि का परम कल्याण ही उनकी बुद्धि है। चन्द्रमा ही उनका मन है, जो समस्त परिवर्तनों का आगार है।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥