श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 1: ईश अनुभूति का प्रथम सोपान  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक
विज्ञानशक्तिं महिमामनन्ति
सर्वात्मनोऽन्त:करणं गिरित्रम् ।
अश्वाश्वतर्युष्ट्रगजा नखानि
सर्वे मृगा: पशव: श्रोणिदेशे ॥ ३५ ॥
 
शब्दार्थ
विज्ञान-शक्तिम्—चेतना; महिम्—पदार्थ का सिद्धान्त; आमनन्ति—वे ऐसा कहते है; सर्व-आत्मन:—सर्व-व्यापी का; अन्त:- करणम्—अहंकार; गिरित्रम्—रुद्र (शिव); अश्व—घोड़ा; अश्वतरि—खच्चर; उष्ट्र—ऊँट; गजा:—हाथी; नखानि—नाखून; सर्वे—अन्य सब; मृगा:—हिरन; पशव:—चौपाये; श्रोणि-देशे—कटि-प्रदेश में ।.
 
अनुवाद
 
 पदार्थ का सिद्धान्त (महत्-तत्त्व) सर्वव्यापी भगवान् की चेतना है, जैसा कि विद्वानों ने बल देकर कहा है तथा रुद्रदेव उनका अहंकार है। घोड़ा, खच्चर, ऊँट तथा हाथी उनके नाखून हैं तथा जंगली जानवर और सारे चौपाये भगवान् के कटि-प्रदेश में स्थित हैं।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥