श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 1: ईश अनुभूति का प्रथम सोपान  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक
इयानसावीश्वरविग्रहस्य
य: सन्निवेष: कथितो मया ते ।
सन्धार्यतेऽस्मिन् वपुषि स्थविष्ठे
मन: स्वबुद्ध्या न यतोऽस्ति किञ्चित् ॥ ३८ ॥
 
शब्दार्थ
इयान्—ये सब; असौ—वह; ईश्वर—परमेश्वर के; विग्रहस्य—स्वरूप का; य:—जो कुछ; सन्निवेश:—जिस तरह वे स्थित हैं; कथित:—कहा गया; मया—मेरे द्वारा; ते—तुमको; सन्धार्यते—एकाग्र कर सकता है; अस्मिन्—इसमें; वपुषि—विराट स्वरूप में; स्थविष्ठे—स्थूल में; मन:—मन; स्व-बुद्ध्या—अपनी बुद्धि से; न—नहीं; यत:—उनसे परे; अस्ति—है; किञ्चित्—कुछ भी ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार मैंने आपको भगवान् के स्थूल भौतिक विराट स्वरूप की अवधारणा का वर्णन किया। जो व्यक्ति सचमुच मुक्ति की इच्छा करता है, वह भगवान् के इस स्वरूप पर अपने मन को एकाग्र करता है, क्योंकि भौतिक जगत में इससे अधिक कुछ भी नहीं है।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (९.१०) में भगवान् ने स्पष्ट कहा है कि प्रकृति तो उनकी आदेशवाहिका है। वह भगवान् की विभिन्न शक्तियों में से एक है और केवल उन्हीं के आदेशानुसार कार्य करती है। वे परम दिव्य भगवान् के रूप में भौतिक तत्त्व पर केवल दृष्टिपात करते हैं; इस तरह पदार्थ का विक्षोभ प्रारम्भ होता है और परिणाम-स्वरूप जो कार्य होते हैं, वे क्रमश: छह प्रकार के भेदों के रूप में प्रकट होते हैं। सारी भौतिक सृष्टि इसी प्रकार से गतिशील है और कालक्रम में यह प्रकट और लुप्त होती रहती है।

जो अल्पज्ञ हैं, वे भगवान् श्रीकृष्ण की उस अचिन्त्य शक्ति की भावना को आत्मसात् नहीं कर पाते, जिसके द्वारा वे मनुष्य के रूप में प्रकट होते हैं (भगवद्गीता ९.११)। इस संसार में हमारे ही जैसे रूप में उनका अवतरित होना भी पतित आत्माओं पर उनकी अहैतुकी कृपा का फल है। वे समस्त भौतिक धारणाओं से ऊपर हैं, किन्तु अपने शुद्ध भक्तों पर असीम कृपा के कारण वे अवतरित होते हैं और साक्षात् भगवान् के रूप में प्रकट होते हैं। भौतिकतावादी चिन्तक तथा वैज्ञानिक परमाणु शक्ति तथा विश्व-रूप की विराटता में ही अत्यधिक उलझे रहते हैं और इस जगत के आध्यात्मिक तात्विक सिद्धान्त की अपेक्षा बाह्य व्यवहार-पक्ष को अधिक मान्यता देते हैं। भगवान् का दिव्य रूप ऐसे भौतिकतावादी कार्यकलापों की सीमा के बाहर है और यह सोच पाना अत्यन्त कठिन है कि भगवान् एक ही साथ अन्तर्यामी तथा सर्वव्यापी हैं, क्योंकि भौतिकतावादी चिन्तक तथा वैज्ञानिक हर बात को अपने निजी अनुभव के आधार पर सोचते हैं। चूँकि वे भगवान् के साकार रूप को नहीं समझ पाते, अतएव भगवान् सदय होकर उन्हें अपना विराट रूप प्रदर्शित करते हैं और श्रील शुकदेव गोस्वामी ने यहाँ भगवान् के इस स्वरूप का विशद् वर्णन किया है। वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि भगवान् के इस विराट रूप के परे कुछ भी नहीं है। कोई भी भौतिकतावादी विचारवान व्यक्ति इस विराट रूप की धारणा से आगे नहीं जा सकता। भौतिकतावादी व्यक्तियों के मन चलायमान हैं और वे निरंतर एक पहलू से दूसरे की ओर बदलते रहते हैं। अतएव मनुष्य को यह सलाह दी जाती है कि वह उनके विराट शरीर के किसी एक अंग का चिन्तन करे और केवल अपनी बुद्धि से ही भौतिक जगत की किसी भी अभिव्यक्ति का चिन्तन कर सकता है—यथा जंगल, पहाड़, समुद्र, मनुष्य, पशु, देवता, पक्षी, पशु या अन्य कुछ। भौतिक अभिव्यक्ति की प्रत्येक वस्तु विराट रूप का कोई न कोई अंग होती है, अतएव चंचल मन भगवान् पर ही स्थिर हो सकता है, अन्य किसी वस्तु पर नहीं। भगवान् के शरीर के विभिन्न अंगों पर ध्यान केन्द्रित करने की इस विधि से आसुरी ईश्वर-विहीनता (निरीश्वरवादी धारणा) की चुनौती क्रमश: क्षीण होती जाएगी और भगवान् की भक्ति में क्रमिक विकास लाया जा सकता है। चूँकि प्रत्येक वस्तु पूर्ण ब्रह्म का अंश है, अतएव नवदीक्षित जिज्ञासु को धीरे-धीरे ईशोपनिषद् के उन मन्त्रों की अनुभूति होगी, जो यह बताते हैं कि ईश्वर सर्वत्र है और इस तरह वह भगवान् के शरीर के प्रति अपराध न करने की कला सीख सकेगा। इस भगवद्भाव से ईश्वर के अस्तित्व को चुनौती देने वाले मनुष्य के गर्व में ह्रास होगा। इस तरह मनुष्य सबके प्रति सम्मान प्रदर्शित कर सकेगा क्योंकि सारी वस्तुएँ उस परम शरीर के अंश हैं।

 
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