श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 1: ईश अनुभूति का प्रथम सोपान  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक
एतावान् सांख्ययोगाभ्यां स्वधर्मपरिनिष्ठया ।
जन्मलाभ: पर: पुंसामन्ते नारायणस्मृति: ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
एतावान्—ये सब; साङ्ख्य—पदार्थ तथा आत्मा विषयक पूर्ण ज्ञान; योगाभ्याम्—योगशक्ति के ज्ञान से; स्व-धर्म—विशिष्ट वृत्तिपरक कर्तव्य; परिनिष्ठया—पूर्ण अनुभूति के द्वारा; जन्म—जन्म; लाभ:—लाभ; पर:—परम; पुंसाम्—पुरुष का; अन्ते— अन्त में; नारायण—भगवान् की; स्मृति:—स्मृति, याद ।.
 
अनुवाद
 
 पदार्थ तथा आत्मा के पूर्ण ज्ञान से, योगशक्ति से या स्वधर्म का भलीभाँति पालन करने से मानव जीवन की जो सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त की जा सकती है, वह है जीवन के अन्त में भगवान् का स्मरण करना।
 
तात्पर्य
 नारायण इस भौतिक सृष्टि से परे परम पुरुष हैं। प्रत्येक वस्तु जिसका सृजन, पालन तथा अन्त में संहार होता है, वह महत् तत्त्व की सीमा के अन्तर्गत है और भौतिक जगत के नाम से विख्यात है, किन्तु नारायण या भगवान् का अस्तित्व इस महत् तत्त्व की परिधि के अन्तर्गत नहीं आता, अतएव नारायण के नाम, रूप, गुण आदि भौतिक जगत की सीमा के परे हैं। मनुष्य को सांख्य दर्शन से, जो पदार्थ तथा आत्मा को पृथक्-पृथक् करता है, अथवा योगशक्ति के अनुशीलन से, जिससे मनुष्य इस ब्रह्माण्ड के भीतर या बाहर के किसी लोक तक पहुँचने में समर्थ बनता है या धार्मिक कृत्य करने से, सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त हो सकती है बशर्ते कि मनुष्य नारायण-स्मृति अवस्था को अर्थात् भगवान् के निरन्तर स्मरण की अवस्था को प्राप्त कर ले। यह शुद्ध भक्त की संगति से ही सम्भव है, क्योंकि भक्त समस्त ज्ञानियों, योगियों या कर्मियों के दिव्य कार्यकलापों को शास्त्रानुमोदित वृत्तिपरक कार्यों से साज सँवार सकता है। इतिहास आध्यात्मिक सिद्धि की प्राप्ति के उदाहरणों से भरा पड़ा है यथा सनकादि ऋषि या नौ प्रसिद्ध योगेन्द्र जिन्होंने भगवान् की भक्ति से ही सिद्धि प्राप्त की। भगवान् का कोई भी भक्त ज्ञानियों या योगियों द्वारा अपनाई गई अन्य विधियों को ग्रहण करके भक्ति के मार्ग से कभी विचलित नहीं हुआ। प्रत्येक व्यक्ति अपने कार्य-विशेष में चरम सिद्धि के लिए उत्सुक रहता है और जैसाकि यहाँ पर संकेत किया गया है कि ऐसी सिद्धि नारायण-स्मृति है, जिसके लिए हर एक को उत्तमोत्तम प्रयास करना चाहिए। दूसरे शब्दों में, जीवन को इस प्रकार ढालना चाहिए कि जीवन के पग-पग पर मनुष्य भगवान् के स्मरण में आगे-आगे ही बढ़ता रहे।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥