श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 1: ईश अनुभूति का प्रथम सोपान  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक
परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्य उत्तमश्लोकलीलया ।
गृहीतचेता राजर्षे आख्यानं यदधीतवान् ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
परिनिष्ठित:—पूर्णतया अनुभूत; अपि—भी; नैर्गुण्ये—अध्यात्म में; उत्तम—प्रबुद्ध; श्लोक—श्लोक; लीलया—लीलाओं के द्वारा; गृहीत—आकृष्ट; चेता:—ध्यान; राजर्षे—हे राजर्षि; आख्यानम्—वर्णन, चित्रण; यत्—जो; अधीतवान्—मैंने अध्ययन किया है ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजर्षि, मैं दृढ़तापूर्वक अध्यात्म में पूर्ण रूप से स्थित था तथापि मैं उन भगवान् की लीलाओं के वर्णन के प्रति आकृष्ट हुआ, जिनका वर्णन उत्तम श्लोकों द्वारा किया जाता है।
 
तात्पर्य
 सर्वप्रथम परम सत्य की अनुभूति दार्शनिक चिन्तन द्वारा निर्विशेष ब्रह्म के रूप में की जाती है और दिव्य ज्ञान की प्रगति के साथ-साथ बाद में परमात्मा रूप में की जाती है। किन्तु, यदि भगवत्कृपा से, कोई निर्विशेषवादी श्रीमद्भागवत के श्रेष्ठ कथनों से प्रबुद्ध होता है, तो वह भगवान् का दिव्य भक्त बन जाता है। अल्प ज्ञान के सहारे हम परम सत्य के व्यक्तित्व को नहीं समझ सकते एवं भगवान् के साकार कार्यकलापों के प्रति अल्पज्ञ निर्विशेषवादी खेद व्यक्त करते हैं। किन्तु तर्कों के साथ-साथ परम सत्य तक पहुँचने की दिव्य विधि कट्टर से कट्टर निर्विशेषवादी को भी भगवान् के साकार कार्यकलापों के प्रति आकृष्ट होने में सहायक बन सकती है। शुकदेव गोस्वामी जैसा व्यक्ति किसी सांसारिक कार्य के प्रति आकृष्ट नहीं होता, किन्तु जब ऐसे भक्त को श्रेष्ठ विधि द्वारा आश्वस्त कर लिया जाता है, तो वह अवश्य ही भगवान् के दिव्य कार्यकलापों के प्रति आकृष्ट होता है। भगवान् दिव्य हैं और उसी तरह उनके कार्यकलाप भी दिव्य हैं। वे न तो निष्क्रिय हैं, न निर्विशेष।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥