श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 1: ईश अनुभूति का प्रथम सोपान  »  ईश-स्तवन

 
श्लोक
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।
 
शब्दार्थ
ॐ—हे भगवन्; नम:—मेरा सादर नमस्कार; भगवते—भगवान् को; वासुदेवाय—वसुदेव के पुत्र भगवान् कृष्ण को। हे सर्वव्यापी भगवन्, मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ ।.
 
अनुवाद
 
 हे सर्वव्यापी भगवन्, मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।
 
तात्पर्य
 वासुदेवाय का अर्थ है ‘वसुदेव के पुत्र कृष्ण को’। चूँकि वासुदेव कृष्ण के नाम-कीर्तन से मनुष्य दान तथा तप के सारे शुभ फल प्राप्त कर सकता है, अतएव ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नामक इस मंत्र के कीर्तन से श्रीमद्भागवत का रचयिता, वक्ता या कोई पाठक आनन्द स्वरूप परमेश्वर कृष्ण को सादर नमस्कार करता है। श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कंध में सृष्टि के नियमों का वर्णन है, अतएव प्रथम स्कंध को ‘सृष्टि’ कहा जा सकता है।
इसी प्रकार द्वितीय स्कंध में ‘सृष्टि का परवर्ती दृश्य जगत’ वर्णित है। इस स्कंध में विभिन्न लोकों का वर्णन, भगवान् के विराट शरीर के विभिन्न भागों के रूप में किया गया है। इस कारण से, इस द्वितीय स्कंध को ‘दृश्य जगत’ कहा जा सकता है। द्वितीय स्कंध में दस अध्याय हैं और इन दस अध्यायों में श्रीमद्भागवत का ध्येय एवं ध्येय के विभिन्न लक्षणों का वृत्तान्त है। पहले अध्याय में कीर्तन की महिमा का वर्णन है और यह ऐसी विधि का संकेत करता है, जिससे नवदीक्षित भक्त भगवान् के विश्वरूप का ध्यान कर सकता है। इसके प्रथम श्लोक में शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित के उन प्रश्नों का उत्तर देते हैं जिनमें उन्होंने एक मरणासन्न मनुष्य के कर्तव्य के बारे में पूछा था। महाराज परीक्षित को शुकदेव गोस्वामी का स्वागत करते हुए हर्ष हो रहा था और उन्हें गर्व था कि वे कृष्ण के अन्तरंग सखा ‘अर्जुन’ के वंशज हैं। वे व्यक्तिगत रूप से अत्यन्त विनीत एवं सौम्य थे, लेकिन उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त की कि कृष्ण उसके पितामहों, पाण्डु के पुत्रों पर, एवं विशेष रूप से उनके पितामह अर्जुन पर अत्यधिक प्रसन्न थे। चूँकि भगवान् कृष्ण महाराज परीक्षित के परिवार से सदैव प्रसन्न रहते थे, अतएव महाराज परीक्षित के मरणासन्न होने पर, आत्म-साक्षात्कार की विधि में सहायता पहुँचाने के लिए, शुकदेव गोस्वामी को भेजा गया था। महाराज परीक्षित अपने बाल्यकाल से भगवान् कृष्ण के भक्त थे, अतएव उनका कृष्ण के प्रति सहज स्नेह था। शुकदेव गोस्वामी इस निष्ठा को जानते थे, अतएव उन्होंने राजा के कर्तव्य के विषय में प्रश्नों का स्वागत किया। चूँकि राजा ने यह संकेत किया था कि प्रत्येक जीव का चरम कर्तव्य भगवान् कृष्ण की सेवा करना है, अतएव शुकदेव गोस्वामी ने इस सुझाव का स्वागत करते हुए कहा “चूँकि आपने कृष्ण विषयक प्रश्न पूछे हैं, अतएव आपका प्रश्न अत्यन्त महिमामय है।” प्रथम श्लोक का अनुवाद इस प्रकार है।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥