श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 10: भागवत सभी प्रश्नों का उत्तर है  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक
प्राणेनाक्षिपता क्षुत् तृडन्तरा जायते विभो: ।
पिपासतो जक्षतश्च प्राङ्‍मुखं निरभिद्यत ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
प्राणेन—जीवनी शक्ति से; आक्षिपता—विचलित होकर; क्षुत्—भूख; तृट्—प्यास; अन्तरा—भीतर से; जायते—उत्पन्न करती हैं; विभो:—परमेश्वर की; पिपासत:—प्यास बुझाने के लिए इच्छुक; जक्षत:—खाने के लिए इच्छुक; च—तथा; प्राक्—पहले; मुखम्—मुँह; निरभिद्यत—प्रकट हुआ ।.
 
अनुवाद
 
 विराट पुरुष द्वारा विचलित किए जाने पर जीवनी शक्ति (प्राण) ने भूख तथा प्यास को उत्पन्न किया और जब विराट पुरुष ने पीने तथा खाने की इच्छा की तो मुँह खुल गया।
 
तात्पर्य
 जिस प्रकार से माता के गर्भ में जीवों के अंगों तथा ऐन्द्रिक अनुभूतियों का विकास होता है उसी प्रकार से समस्त जीवों से समष्टि रूप विराट पुरुष का भी विकास होता प्रतीत होता है, अत: समस्त सृजन कार्य का परम कारण निर्गुण या निश्चेष्ट नहीं है। भगवान् मेंं भी समस्त प्रकार की कर्मेन्द्रियों तथा ज्ञानेन्द्रियों की अनुभूतियाँ रहती हैं और इस तरह वे प्रत्येक व्यक्ति में घटित होती हैं। यह इच्छा या चेष्टा परम पुरुष का स्वभाव है। चूँकि वे समस्त मुखों की समष्टि हैं, अत: अलग-अलग जीवात्माओं में मुख होता है। इसी प्रकार से अन्य सारी इन्द्रियाँ तथा उनके अंग भी होते हैं। यहाँ पर मुख समस्त इन्द्रियों का प्रतीक स्वरुप है, क्योंकि अन्यों पर भी यही नियम लागू होते हैं।
 
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