श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 10: भागवत सभी प्रश्नों का उत्तर है  »  श्लोक 18

 
श्लोक
मुखतस्तालु निर्भिन्नं जिह्वा तत्रोपजायते ।
ततो नानारसो जज्ञे जिह्वया योऽधिगम्यते ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
मुखत:—मुख से; तालु—तालू; निर्भिन्नम्—उत्पन्न; जिह्वा—जीभ; तत्र—तत्पश्चात्; उपजायते—प्रगट होती है; तत:—तत्पश्चात्; नाना-रस:—अनेक स्वाद; जज्ञे—प्रकट हुए; जिह्वया—जीभ से; य:—जो; अधिगम्यते—आस्वादित होते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 मुख से तालू प्रकट हुआ और फिर जीभ भी उत्पन्न हुई। इन सबके बाद विविध स्वादों की उत्पत्ति हुई जिससे जीभ उनका स्वाद ले सके।
 
तात्पर्य
 विकास की यह क्रमिक प्रक्रिया नियामक देवों (अधिदैव) की व्याख्या प्रस्तुत करती है, क्योंकि आस्वाद्य रसों का नियामक देव वरुण है। अत: मुख जीभ का आश्रय-स्थल बनता है, जो विभिन्न रसों का आस्वाद करती है, जिनका नियामक देव वरुण है। इससे ऐसा लगता है कि जीभ के साथ ही वरुण भी उत्पन्न हुआ। जीभ तथा तालू निमित्तमात्र होने के कारण अधिभूत या पदार्थ के रूप हैं
जब कि कार्य करने वाला देव अधिदैव है, जो कि जीव है तथा जिस पुरुष पर कार्य किया जाता है, वह अध्यात्म है। इस प्रकार विराट पुरुष के मुख खुलने के पश्चात् तीनों श्रेणियों के जन्म की व्याख्या हो जाती है। प्रस्तुत श्लोक में चार सिद्धान्त दिए गये हैं जिनसे पहले बताए गये तीन प्रमुख तत्त्वों— अध्यात्म, अधिदैव तथा अधिभूतम्—की व्याख्या हो जाती है।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥