श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 10: भागवत सभी प्रश्नों का उत्तर है  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक
दशमस्य विशुद्ध्यर्थं नवानामिह लक्षणम् ।
वर्णयन्ति महात्मान: श्रुतेनार्थेन चाञ्जसा ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
दशमस्य—दसवें (आश्रय) का; विशुद्धि—एकमात्र; अर्थम्—कारण; नवानाम्—अन्य नौ के; इह—इसी श्रीमद्भागवत में; लक्षणम्—लक्षण; वर्णयन्ति—वर्णन करते हैं; महा-आत्मान:—ऋषिगण; श्रुतेन—वैदिक साक्ष्यों से; अर्थेन—प्रत्यक्ष व्याख्या द्वारा; च—तथा; अञ्जसा—संक्षिप्त रूप में ।.
 
अनुवाद
 
 इनमें से जो दसवाँ ‘आश्रय’ तत्त्व है उसकी दिव्यता को अन्यों से पृथक् करने के लिए, उन सबका वर्णन कभी वैदिक साक्ष्य से, कभी प्रत्यक्ष व्याख्या से और कभी महापुरुषों द्वारा दी गई संक्षिप्त व्याख्याओं से किया जाता है।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥