श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 10: भागवत सभी प्रश्नों का उत्तर है  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक
गुणात्मकानीन्द्रियाणि भूतादिप्रभवा गुणा: ।
मन: सर्वविकारात्मा बुद्धिर्विज्ञानरूपिणी ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
गुण-आत्मकानि—गुणों से लिप्त; इन्द्रियाणि—इन्द्रियाँ; भूत-आदि—अहंकार; प्रभवा:—से प्रभावित; गुणा:—प्राकृतिक गुण; मन:—मन; सर्व—समस्त; विकार—तनाव (सुख तथा दुख); आत्मा—रूप; बुद्धि:—बुद्धि; विज्ञान—तर्क-वितर्क; रूपिणी—के रूप वाली ।.
 
अनुवाद
 
 इन्द्रियाँ प्रकृत्ति के गुणों से जुड़ी होती हैं और भौतिक प्रकृति के ये गुण मिथ्या अहंकार से जनित हैं। मन पर समस्त प्रकार के भौतिक अनुभवों (सुख-दुख) का प्रभाव पड़ता है और बुद्धि मन के तर्क-वितर्क स्वरूप है।
 
तात्पर्य
 भौतिक प्रकृति से भ्रमित होकर जीवात्मा मिथ्या अंहकार करता है। अधिक स्पष्ट रूप में कहना चाहें तो जीवात्मा भौतिक शरीर के भीतर बँध जाने पर तुरन्त देहात्मक सम्बन्ध बना लेता है और आत्मा के रूप में अपनी स्थिति को भुला देता है। यह अहंकार भौतिक प्रकृति के विभिन्न गुणों से मिल-जुल जाता है और इस प्रकार इन्द्रियों का गुणों की ओर लगाव हो जाता हैं। मन वह यंत्र है, जिससे विभिन्न भौतिक अनुभवों का आभास होता है, किन्तु बुद्धि तर्कशील होती है और हर वस्तु को अच्छे के लिए बदल सकती है। अत: बुद्धिमान मनुष्य बुद्धि के सदुपयोग से इस संसार के मोह से मोक्ष प्राप्त कर सकता है। बुद्धिमान मनुष्य इस संसार की विषम परिस्थिति का पता लगा सकता है और इस खोज में लग जाता है कि वह कौन है, उसे तरह-तरह के कष्ट क्यों मिलते हैं, इनसे कैसे छुटकारा पाया जा सकता है और इस प्रकार अच्छी संगति से बुद्धिमान मनुष्य आत्म-साक्षात्कार के जीवन की ओर उन्मुख हो सकता है। अत: यह सलाह दी जाती है कि बुद्धिमान मनुष्य उन ऋषियों- मुनियों की संगति करे जो मुक्ति के पथ पर अग्रसर हैं। ऐसी संगति से वह ऐसे उपदेश प्राप्त कर सकता है जिनसे बद्धजीव की पदार्थ के प्रति आसक्ति कम हो सकती है। इस प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति धीरे-धीरे पदार्थ के मोह तथा अहंकार से छूटकर सच्चिदानन्दमय जीवन को प्राप्त होता है।
 
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