श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 10: भागवत सभी प्रश्नों का उत्तर है  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक
अत: परं सूक्ष्मतममव्यक्तं निर्विशेषणम् ।
अनादिमध्यनिधनं नित्यं वाङ्‍मनस: परम् ॥ ३४ ॥
 
शब्दार्थ
अत:—अत:; परम्—दिव्य; सूक्ष्मतमम्—सूक्ष्म से भी सूक्ष्म; अव्यक्तम्—अप्रकट; निर्विशेषणम्—बिना भौतिक रूप के; अनादि—आदिरहित; मध्य—माध्यमिक अवस्था के बिना; निधनम्—अन्तरहित; नित्यम्—शाश्वत; वाक्—शब्द; मनस:—मन का; परम्—दिव्य ।.
 
अनुवाद
 
 अत: इस (स्थूल संसार) से परे दिव्य संसार है, जो सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर है। न तो इसका आदि है, न मध्य और न अन्त, अत: यह व्याख्या अथवा चिन्तन की सीमाओं के परे है और भौतिक बोध से भिन्न है।
 
तात्पर्य
 परमेश्वर का स्थूल बाह्य रूप बीच-बीच में प्रकट होता रहता है, अत: यह रूप शाश्वत रूप नहीं हैं जिसका न तो आदि है, न मध्य और न कोई अन्त। जिस वस्तु का आदि, मध्य और अन्त होता है, वह भौतिक कहलाती है। इस भौतिक जगत का प्रारम्भ भगवान् से हुआ, अत: जगत के प्रारम्भ के पूर्व भगवान् निश्चय ही सूक्ष्म से सूक्ष्म दिव्यरूप में रहते हैं। भौतिक जगत का आकाश सूक्ष्मतम माना जाता है। इससे सूक्ष्म मन, बुद्धि तथा मिथ्या अहंकार होते हैं। किन्तु आठों बाह्य आवरणों को परम सत्य के बाह्य आवरणों के रूप में बताया जाता है, अत: परम सत्य भौतिक अवधारणाओं की व्याख्या एवं कल्पना से परे हैं। वे निश्चित ही सभी भौतिक चिंतन से परे हैं। यह निर्विशेषणम् कहलाता है, किन्तु निर्विशेषणम् को दिव्य गुणों से विहीन समझने की गलती नहीं करनी चाहिए। विशेषणम् का अर्थ है गुण, अत: निर् के जुडऩे से निर्विशेषणम् का अर्थ भौतिक गुणों या विविधताओं से रहित हो जाता है। इस निषेधात्मक पद में चार दिव्य गुण हैं—अप्रकट, दिव्य, शाश्वत तथा मन एवं वाणी से परे। शब्दों की सीमाओं से परे का अर्थ है भौतिक बोध का निषेध। जब तक मनुष्य दिव्य पद को प्राप्त नहीं होता वह भगवान् के दिव्य रूप को नहीं जान सकता।
 
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