श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 10: भागवत सभी प्रश्नों का उत्तर है  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक
स्थितिर्वैकुण्ठविजय: पोषणं तदनुग्रह: ।
मन्वन्तराणि सद्धर्म ऊतय: कर्मवासना: ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
स्थिति:—उचित दशा; वैकुण्ठ-विजय:—वैकुण्ठ के स्वामी की विजय; पोषणम्—पालन; तत्-अनुग्रह:—अहैतुकी कृपा; मन्वन्तराणि—मनुओं के शासन; सत्-धर्म:—पूर्ण धर्म; ऊतय:—कार्य करने की प्रेरणा; कर्म-वासना:—सकाम कर्म की आकांक्षा ।.
 
अनुवाद
 
 जीवात्मा के लिए उचित तो यही है कि वह भगवान् के नियमों का पालन करे और पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के संरक्षण में पूरी तरह से मानसिक शान्ति प्राप्त करे। सभी मनु तथा उनके नियम जीवन को सही दिशा प्रदान करने के लिए हैं। कार्य करने की प्रेरणा ही सकाम कर्म की आकांक्षा है।
 
तात्पर्य
 यह भौतिक संसार सृजित होता है, कुछ काल तक बना रहता है और भगवान् की इच्छा से पुन: विनष्ट हो जाता है। सृष्टि के अवयवों तथा उपस्रष्टा ब्रह्मा की उत्पत्ति भगवान् विष्णु द्वारा अपने प्रथम तथा द्वितीय अवतारों में की जाती है। प्रथम पुरुष अवतार महाविष्णु हैं और दूसरे पुरुष अवतार गर्भोदकशायी विष्णु हैं, जिनसे ब्रह्मा उत्पन्न हुए। तृतीय पुरुष अवतार क्षीरोदकशायी विष्णु हैं, जो ब्रह्माण्ड की प्रत्येक वस्तु में परमात्मास्वरूप स्थित रहते हैं और ब्रह्मा द्वारा रची गई सृष्टि का पालन करते हैं। ब्रह्मा के अनेक पुत्रों में से शिव भी एक हैं जिनका कार्य इस सृष्टि का संहार है। अत: ब्रह्माण्ड के मूल स्रष्टा तो विष्णु हैं और वे अपनी अहैतुकी कृपा से उत्पन्न जीवों के पालक भी हैं। इस प्रकार समस्त बद्धजीवों को भगवान् की श्रेष्ठता स्वीकार करनी चाहिए और उनके शुद्ध भक्त बनकर इस कष्टमय तथा संकटमय संसार में शान्तिपूर्वक रहना चाहिए। इस संसार को अपनी इन्द्रिय-तुष्टि के लिए उपयुक्त समझने और इस प्रकार विष्णु की बहिरंगा शक्ति द्वारा मोहग्रस्त होने के कारण बद्धजीव को सृष्टि तथा विनाश के प्राकृतिक नियमों को फिर से भोगने के लिए रहना पड़ता है।

भगवद्गीता में कहा गया है कि ब्रह्माण्ड के सर्वोच्चलोक से लेकर सबसे निचले लोक पाताललोक तक के सारे लोक नाशवान हैं और बद्धजीव अपने अच्छे या बुरे कर्मों से या आधुनिक अन्तरिक्ष यान से अन्तरिक्ष में विचरण कर सकते हैं, किन्तु कही पर भी उनकी मृत्यु निश्चित है। हाँ, भिन्न-भिन्न लोकों में उनकी आयु पृथक्-पृथक् होती है। किन्तु शाश्वत जीवन प्राप्त करने का एकमात्र उपाय है भगवान् के धाम को वापस जाना जहाँ पर भौतिक लोकों की भाँति पुनर्जन्म नहीं होता। वैकुण्ठ के स्वामी के साथ अपने सम्बन्धों को विसरा देने के कारण बद्धजीव इस सीधी-सी बात से अनजान रहकर इस भौतिक जगत में स्थायी जीवन बिताने की योजना बनाने का प्रयास करते हैं। बहिरंगा शक्ति से मोहित होने के कारण वे विभिन्न प्रकार के आर्थिक तथा धार्मिक विकास कार्यों में व्यस्त हो जाते हैं और यह भूल जाते हैं कि उनका उद्देश्य भगवान् के धाम वापस जाना है। माया के प्रभाव से यह विस्मृति इतनी प्रबल होती है कि बद्धजीव भगवान् के धाम वापस जाना ही नहीं चाहते। इन्द्रिय-सुख के कारण वे बार-बार जन्म-मरण के चक्र में फँसते रहते हैं और मनुष्य जीवन को बिगाड़ लेते हैं जिसमें ही भगवान् के धाम को वापस जाने के अवसर प्राप्त होते हैं। विभिन्न युगों तथा कल्पों में मनु ने जो आदेशात्मक शास्त्र बनाये वे सद्धर्म कहलाते हैं। वे मनुष्यों के लिए सन्मार्ग दिखाने वाले हैं, अत: मनुष्यों को चाहिए कि वे अपने हित में तथा अन्त-काल को सफल बनाने के लिए इन शास्त्रों का उपयोग करें। सृष्टि मिथ्या नहीं है, किन्तु यह अस्थायी प्राकट्य है और बद्धजीवों को भगवान् के धाम वापस जाने के लिए अवसर प्रदान करने के लिए है। भगवान् के पास जाने की इच्छा तथा उस दिशा में किये गये कार्यों से ही कर्म का सन्मार्ग बनता है। जो ऐसे नियमित पथ का अनुसरण करते हैं, भगवान् अपने उन भक्तों को अहैतुकी कृपावश संरक्षण प्रदान करते हैं, किन्तु जो अभक्त हैं, वे सकाम कर्मों के बन्धन में फँसकर अपने को कार्यकलापों के जोखिम में डाल देते हैं। इस प्रसंग में सद्धर्म शब्द महत्त्वपूर्ण है। सद्धर्म अर्थात् भगवान् के धाम वापस जाने के लिए अपना कर्तव्य करना और इस तरह शुद्ध भक्त बनना पवित्र कार्य है। अन्य सभी लोग पवित्र होने का ढोंग रचते हैं, किन्तु वास्तव में वे ऐसे होते नहीं। इसीलिए भगवान् ने भगवद्गीता में उपदेश दिया है कि मनुष्य को समस्त तथाकथित धार्मिक कार्यों को त्यागकर भगवान् की भक्ति-मय सेवा में लग जाना चाहिए जिससे वह इस भौतिक संसार के भयावह जीवन के समस्त कष्टों से मुक्त हो सके। सद्धर्म में स्थित रहने के लिए कार्य करना ही जीवन की सही दिशा है। मनुष्य का उद्देश्य भगवान् के धाम जाना होना चाहिए न कि अस्थायी जीवन के लिए उत्तम या निष्कृष्ट शरीर ग्रहण करके इस संसार के जन्म-मरण के आवागमन में फँसना। इसी में मानव जीवन की बुद्धिमत्ता है और मनुष्य को ऐसे ही जीवन के कार्यकलापों की आकांक्षा करनी चाहिए।

 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥