श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 10: भागवत सभी प्रश्नों का उत्तर है  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक
तत: कालाग्निरुद्रात्मा यत्सृष्टमिदमात्मन: ।
संनियच्छति तत् काले घनानीकमिवानिल: ॥ ४३ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—तत्पश्चात्, अन्त में; काल—विनाश, मृत्यु; अग्नि—आग; रुद्र-आत्मा—रुद्र रूप में; यत्—जो भी; सृष्टम्—उत्पन्न; इदम्—ये सब; आत्मन:—अपने आप; सम्—पूर्णतया; नियच्छति—संहार करता है; तत् काले—युग (कल्प) के अन्त में; घन-अनीकम्—बादलों का समूह; इव—सदृश; अनिल:—वायु ।.
 
अनुवाद
 
 तत्पश्चात् युग के अन्त में भगवान् स्वयं संहारकर्ता रुद्र-रूप में सम्पूर्ण सृष्टि का उसी तरह संहार करेंगे जिस प्रकार वायु बादलों को हटा देती है।
 
तात्पर्य
 इस सृष्टि की उपमा उचित रूप से बादलों से दी गई है। बादल आकाश में उत्पन्न किये जाते हैं या स्थित रहते हैं और जब उन्हें अस्त-व्यस्त किया जाता है, तो वे उसी आकाश में अनदिखे रहते हैं। इसी प्रकार यह सारी सृष्टि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् द्वारा अपने ब्रह्मा रूप में रची जाती है। उन्हीं के द्वारा विष्णु रूप में पालित होती है और यथासमय रुद्र रूप में विनष्ट कर दी जाती है। भगवद्गीता (८.१९-२०) में यह सृष्टि, इसका पालन तथा संहार अच्छे ढंग से व्याख्यायित हुए हैं—

भूतग्राम: स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।

रात्र्यागमेऽवश: पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥

परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातन:।

य: स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥

इस जगत का स्वभाव है कि पहले अच्छे ढंग से इसकी उत्पत्ति होती है, फिर यह अच्छी तरह विकसित होता है और अनेक वर्षों तक (बड़े से बड़े गणितज्ञ की गणना से परे) स्थित रहता है और फिर ब्रह्मा की रात्रि के समय बिना किसी अवरोध के इसका पुन: विनष्ट हो जाता है। ब्रह्मा की रात्रि के बीतने पर सृष्टि रूप में यह पुन: प्रकट होकर पुन: पालन तथा संहार के चक्र से होकर गुजरता है। जो मूर्ख बद्धजीव इस क्षणिक संसार को स्थायी मानता है उसे यह बुद्धिपूर्वक सीखना चाहिए कि ऐसी सृष्टि तथा विनाश क्यों घटित होते हैं। भौतिक जगत के सकाम कर्मी परमेश्वर के भौतिक कारकों द्वारा प्रदत्त भौतिक पदार्थों तथा शक्ति से बड़े-बड़े उद्योग, बड़े-बड़े घराने, बड़े-बड़े साम्राज्य तथा अन्य बड़ी-बड़ी चीजें उत्पन्न करने के लिए अत्यन्त उत्सुक रहते हैं। बद्धजीव इन साधनों से तथा मूल्यवान शक्ति से उत्पत्ति करके अपनी सनक तो पूरी कर लेता है, किन्तु इच्छा न होते हुए उसे इन सारी वस्तुओं को छोड़ करके बारम्बार इसी तरह उत्पत्ति करने के लिए जीवन के दूसरे पहलू में प्रविष्ट होना पड़ता है। ऐसे मूर्ख बद्धजीवों को जो इस क्षणिक संसार में अपनी शक्ति का अपव्यय करते हैं भगवान् आशान्वित करने के लिए सूचित करते हैं कि एक अन्य प्रकृति भी है, जो बार-बार सृष्टि या विनष्ट हुए बिना शाश्वत है और बद्धजीव यह समझ सकता है कि वह क्या करे और शक्ति का किस प्रकार सदुपयोग करे। परम इच्छा से यथासमय निश्चित रूप से नष्ट होने वाले पदार्थ में अपनी शक्ति को नष्ट करने के बजाय बद्धजीव को चाहिए कि इस शक्ति को भगवान् की भक्ति में लगाए जिससे वह अन्य शाश्वत प्रकृति में जा सके जहाँ न जन्म है, न मृत्यु, न सृष्टि है और न प्रलय—वरन् वहाँ ज्ञान से परिपूर्ण और असीमित आनन्द भरा शाश्वत जीवन हैं। इस प्रकार इस नश्वर जगत की सृष्टि और विनाश बद्धजीव को, जो क्षणिक वस्तुओं के प्रति आसक्त रहता है, सचेत करने के लिए ही होता है। इसका उद्देश्य बद्धजीव को आत्म-साक्षात्कार का अवसर प्रदान करना है, न कि इन्द्रियतृप्ति का जो सभी सकाम कर्मियों का मूल लक्ष्य होता है।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥