श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 10: भागवत सभी प्रश्नों का उत्तर है  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक
इत्थंभावेन कथितो भगवान् भगवत्तम: ।
नेत्थंभावेन हि परं द्रष्टुमर्हन्ति सूरय: ॥ ४४ ॥
 
शब्दार्थ
इत्थम्—इन रूपों में; भावेन—सृष्टि तथा संहार का विचार; कथित:—कहा गया; भगवान्—भगवान्; भगवत्-तम:—महान् तत्त्वज्ञानियों द्वारा; न—नहीं; इत्थम्—इसमें; भावेन—स्वरूप; हि—केवल; परम्—अत्यन्त महिमावान; द्रष्टुम्—देखने के लिए; अर्हन्ति—योग्य होते हैं; सूरय:—परम भक्त ।.
 
अनुवाद
 
 बड़े-बड़े तत्त्वज्ञानी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के कार्यकलापों का ऐसा ही वर्णन करते हैं, किन्तु शुद्ध भक्त भावातीत दशा में ऐसे रूपों से भी बढक़र महिमामय वस्तुएँ देखने के अधिकारी होते हैं।
 
तात्पर्य
 भगवान् केवल अपनी विविध शक्तियों से उत्पन्न भौतिक संसार के ही स्रष्टा तथा संहारक नहीं है। वे मात्र स्रष्टा तथा संहारक से बढक़र हैं, क्योंकि उनका एक आनन्द-रूप भी है। भगवान् का यह आनन्द रूप केवल शुद्ध भक्तों के लिए गम्य है, अन्यों के द्वारा नहीं। निर्विशेषवादी भगवान् के सर्वव्यापी प्रभाव को समझ कर ही तुष्ट हो जाता है। यह ब्रह्म-साक्षात्कार कहलाता है। निर्विशेषवादी से भी बड़ा वह योगी है, जो भगवान् को उनके अंश रूप परमात्मा के रूप में अपने हृदय में स्थित देखता है। किन्तु ऐसे शुद्ध भक्त भी हैं, जो प्रेमाभक्ति के आदान-प्रदान से भगवान् की आनन्द शक्ति में हिस्सा बँटाते हैं। भगवान् अपने शाश्वत धाम वैकुण्ठ लोक में सदैव अपने पार्षदों के साथ रहते हैं और अपने भक्तों की विभिन्न दिव्य रसों में की गई दिव्य प्रेममयी सेवा का आनन्द उठाते हैं। इस प्रकार सृष्टि के प्राकट्य की अवधि में शुद्ध भक्त भगवान की भक्तिमय सेवा का अभ्यास करते हैं और वे अपने को भगवान् के धाम जाने के लिए योग्य बनाकर पूरा लाभ उठाते हैं। भगवद्गीता (१८.५५) में इसकी पुष्टि यों हुई है—

भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वत:।

ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥

शुद्ध भक्ति-मय सेवा के विकास से ही भगवान् के वास्तविक रूप को जाना जा सकता है और इस प्रकार उनकी प्रामाणिक सेवा में प्रशिक्षित हुआ जा सकता है और अन्याय रूपों में भगवान् की प्रत्यक्ष संगति में पहुँचा जा सकता। भगवान् की सर्वोच्च संगति गोलोक वृन्दावन लोक में सम्भव है जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण गोपियों तथा अपनी चहेती सुरभि गायों के साथ रमण करते हैं। ब्रह्म-संहिता में श्रीकृष्ण की इस दिव्यभूमि का वर्णन आया है, जिसे भगवान् श्री चैतन्य इस विषय का अत्यन्त प्रामाणिक साहित्य मानते हैं।

 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥