श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 10: भागवत सभी प्रश्नों का उत्तर है  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक
अयं तु ब्रह्मण: कल्प: सविकल्प उदाहृत: ।
विधि: साधारणो यत्र सर्गा: प्राकृतवैकृता: ॥ ४६ ॥
 
शब्दार्थ
अयम्—सृष्टि तथा संहार की यह क्रिया; तु—लेकिन; ब्रह्मण:—ब्रह्मा का; कल्प:—ब्रह्मा का एक दिन; स-विकल्प:— ब्रह्माण्डों की अवधि समेत; उदाहृत:—उदाहरण के रूप में; विधि:—विधि-विधान; साधारण:—संक्षेप में; यत्र—जिसमें; सर्गा:—सृष्टि; प्राकृत—प्रकृति के विषय में; वैकृता:—विनियोग, व्यय ।.
 
अनुवाद
 
 यहाँ पर सारांश रुप में वर्णित सृष्टि तथा संहार का यह प्रक्रम ब्रह्मा के एक दिन (कल्प) के लिए विधि-विधान स्वरूप है। यही महत्-सृष्टि का भी नियामक-विधान है, जिसमें प्रकृति विसर्जित हो जाती है।
 
तात्पर्य
 सृष्टि के तीन प्रकार हैं—महाकल्प, विकल्प तथा कल्प। महाकल्प में भगवान् महत् तत्त्व तथा सोलह प्रकार के सृजक तत्त्वों तथा साधनों की समस्त शक्तियों सहित कारणोदकशायी विष्णु के रूप में प्रथम पुरुष अवतार धारण करते हैं। सृजक कारणों की संख्या ग्यारह है, अवयवों की पाँच है और ये सभी महत् अर्थात् भौतिक अहंकार के फलस्वरूप हैं। कारणोदकशायी विष्णु के रूप में भगवान् द्वारा की गई सृष्टि महाकल्प कहलाती है। ब्रह्मा की सृष्टि तथा भौतिक अवयवों का विसर्जन विकल्प कहलाता है और ब्रह्मा के जीवन के प्रत्येक दिन की सृष्टि कल्प कहलाती है। इसीलिए ब्रह्मा का एक-एक दिन कल्प कहलाता है और ब्रह्मा के दिनों में ऐसे तीस कल्प होते हैं। इसकी पुष्टि भगवद्गीता (८.१७) में भी इस प्रकार हुई है—

सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदु:।

रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जना: ॥

उच्चतर लोकों का एक दिन तथा एक रात्रि पृथ्वी के एक पूरे वर्ष के तुल्य होते हैं। इसको आज के विज्ञानी भी मानते हैं और अन्तरिक्ष यात्रियों ने भी इसकी पुष्टि की है। इसी तरह और उच्चतर लोकों में दिन-रात्रि की अवधि स्वर्गलोकों से दीर्घतर होती है। चारों युगों की गणना स्वर्गिक पंचांगों के आधार पर की जाती है। इस प्रकार इनका काल स्वर्गलोकों की परिभाषा में बारह हजार वर्ष है। यह दिव्य युग कहलाता है। ऐसे एक हजार दिव्य युग ब्रह्मा के एक दिन के तुल्य होते हैं। ब्रह्मा के एक दिन की सृष्टि को कल्प कहते हैं। ब्रह्मा की सृष्टि विकल्प कहलाती है। जब महाविष्णु की श्वास से विकल्प सम्भव होते हैं, तो यह महाकल्प कहलाता है। इस प्रकार महाकल्प, विकल्प तथा कल्प का नियमित चक्र चलता रहता है। इसके सम्बन्ध में महाराज परीक्षित द्वारा पूछे गये प्रश्नों के जो उत्तर शुकदेव गोस्वामी ने दिये वे स्कन्द पुराण के प्रभास खण्ड में दिये गये हैं और वे इस प्रकार हैं—

प्रथम: श्वेतकल्पश्च द्वितीयो नीललोहित:।

वामदेवस्तृतीयस्तु ततो गाथान्तरोऽपर: ॥

रौरव: पञ्चम: प्रोक्त: षष्ठ: प्राण इति स्मृत:।

सप्तमोऽथ बृहत्कल्प: कन्दर्पोऽष्टम उच्यते ॥

सद्योथ नवम: कल्प ईशानो दशम:स्मृत:।

ध्यान एकादश: प्रोक्तास्तथा सारस्वतोऽपर: ॥

त्रयोदश उदानस्तु गरुडोऽथ चतुर्दश:।

कौर्म: पञ्चदशो ज्ञेय: पौर्णमासी प्रजापते: ॥

षोडशो नारसिंहस्तु समाधिस्तु ततोऽपर:।

आग्नेयो विष्णुज: सौर: सोमकल्पस्ततोऽपर: ॥

द्वाविंशो भावन: प्रोक्त: सुपुमानिति चापर:।

वैकुण्ठश्चार्ष्टिषस्तद्वद्वलीकल्पस्ततोऽपर: ॥

सप्तविंशोऽथ वैराजो गौरीकल्पस्तथापर:।

माहेश्वरस्तथा प्रोक्तस्त्रिपुरो यत्र घातित:।

पितृकल्पस्तथाचान्ते य: कुहूर्ब्रह्मण: स्मृता ॥

इस प्रकार ब्रह्मा के तीस कल्प ये हैं: (१) श्वेतकल्प, (२) नीललोहित, (३) वामदेव, (४) गाथान्तर, (५) रौरव, (६) प्राण, (७) बृहत्-कल्प, (८) कन्दर्प, (९) सद्योथ, (१०) ईशान, (११) ध्यान, (१२) सारस्वत, (१३) उदान, (१४) गरुड, (१५) कौर्म, (१६) नारसिंह, (१७) समाधि, (१८) आग्नेय, (१९) विष्णुज, (२०) सौर, (२१) सोम-कल्प, (२२) भावन, (२३) सुपुम, (२४) वैकुण्ठ, (२५) अर्चिष, (२६) वलीकल्प, (२७) वैराज, (२८) गौरीकल्प, (२९) माहेश्वर, (३०) पैतृ-कल्प।

ये तीसों ब्रह्मा के दिन हैं और उन्हें महीनों से लेकर लगातार एक सौ वर्षों तक रहना होता है, अत: हम अनुमान लगा सकते हैं कि केवल कल्पों में कितनी सृष्टियाँ होती होंगी। इसके बाद विकल्प होते हैं जिनकी उत्पत्ति महाविष्णु की श्वास से होती है जैसाकि ब्रह्म-संहिता में कहा गया है (यस्यैकनिश्वासितकालम् अथावलम्ब्य जीवन्ति लोमविलजा जगदण्डनाथा:)। सारे ब्रह्मा महाविष्णु के निश्वास अवधि के दौरान ही जीवित रहते हैं। अत: विष्णु के श्वास-निश्वास महाकल्प हैं। ये सब पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के ही कारण हैं, क्योंकि उनके अतिरिक्त सारी सृष्टियों का अन्य कोई स्वामी नहीं है।

 
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