श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 10: भागवत सभी प्रश्नों का उत्तर है  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक
परिमाणं च कालस्य कल्पलक्षणविग्रहम् ।
यथा पुरस्ताद्व्याख्यास्ये पाद्मं कल्पमथो श‍ृणु ॥ ४७ ॥
 
शब्दार्थ
परिमाणम्—माप; च—भी; कालस्य—समय की; कल्प—ब्रह्मा का एक दिन; लक्षण—लक्षण; विग्रहम्—रूप; यथा—जिस तरह; पुरस्तात्—इसके बाद; व्याख्यास्ये—बताया जाएगा; पाद्मम्—पाद्म नाम से; कल्पम्—एक दिन की अवधि; अथो—इस तरह; शृणु—सुनो ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजन्, आगे चलकर मैं काल के स्थूल तथा सूक्ष्म रूपों की माप का उनके विशिष्ट लक्षणों सहित वर्णन करूँगा, किन्तु इस समय मैं तुमसे पाद्म कल्प के विषय में कहना चाहता हूँ।
 
तात्पर्य
 ब्रह्मा के कल्प की वर्तमान अवधि वराह कल्प अथवा श्वेत वराह कल्प कहलाती है, क्योंकि जब विष्णु के उदर से निकले हुए कमल (पद्म) से ब्रह्मा उत्पन्न हुए तो उस समय भगवान् वराह के रूप में अवतरित हुए थे। इसीलिए वराह कल्प को पाद्मकल्प भी कहते हैं और भागवत के प्रथम भाष्यकार स्वामी श्रीधर का अनुसरण करते हुए जीव गोस्वामी तथा विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर जैसे आचार्यों ने इसकी पुष्टि की है। अत: ब्रह्मा के वराह कल्प तथा पाद्मकल्प में कोई विरोधाभास नहीं है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥