श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 10: भागवत सभी प्रश्नों का उत्तर है  »  श्लोक 49-50
 
 
श्लोक
क्षत्तु: कौशारवेस्तस्य संवादोऽध्यात्मसंश्रित: ।
यद्वा स भगवांस्तस्मै पृष्टस्तत्त्वमुवाच ह ॥ ४९ ॥
ब्रूहि नस्तदिदं सौम्य विदुरस्य विचेष्टितम् ।
बन्धुत्यागनिमित्तं च यथैवागतवान् पुन: ॥ ५० ॥
 
शब्दार्थ
क्षत्तु:—विदुर की; कौशारवे:—मैत्रेय की; तस्य—उनका; संवाद:—समाचार; अध्यात्म—दिव्य ज्ञान के विषय; संश्रित:—से पूरित; यत्—जो; वा—अन्य कुछ; स:—वह; भगवान्—भगवान्; तस्मै—उससे; पृष्ट:—पूछा; तत्त्वम्—सत्य; उवाच—उत्तर दिया; ह—पुराकाल में; ब्रूहि—कृपया कहें; न:—हमसे; तत्—वे विषय; इदम्—यहाँ; सौम्य—हे सौम्य; विदुरस्य—विदुर का; विचेष्टितम्—कार्यकलाप; बन्धु-त्याग—मित्रों के परित्याग का; निमित्तम्—कारण; च—भी; यथा—जिस प्रकार; एव— भी; आगतवान्—(घर) वापस आया; पुन:—फिर से ।.
 
अनुवाद
 
 शौनक ऋषि ने कहा—आप हमें बताएँ कि विदुर तथा मैत्रेय के बीच अध्यात्म पर चर्चा हुई, विदुर ने क्या पूछा और मैत्रेय ने क्या उत्तर दिया था। कृपा करके हमें यह भी बताएँ कि विदुर ने अपने कुटुम्बियों को क्यों छोड़ा था और वे पुन: घर क्यों लौट आये? तीर्थस्थानों की यात्रा के समय उन्होंने जो कार्य किये उन्हें भी बतलाएँ।
 
तात्पर्य
 श्रीसूत गोस्वामी संसार की सृष्टि तथा संहार की कथाएँ सुना रहे थे, किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि शौनक आदि ऋषि अध्यात्म विषयों को, जो भौतिक विषयों से ऊँचे स्तर पर हैं, सुनने के लिए अधिक इच्छुक थे। मनुष्यों की दो श्रेणी होती हैं—एक तो वे जो स्थूल देह तथा भौतिक संसार में अधिक लिप्त रहते हैं और दूसरे वे जो उच्च स्तर पर रहने के कारण दिव्य ज्ञान के प्रति अधिक उत्सुक होते हैं। श्रीमद्भागवत प्रत्येक व्यक्ति के लिए, चाहे वह भौतिकतावादी हो अथवा गुणातीतवादी (अध्यात्मवादी) हो, सुविधा प्रदान करने वाला है। लोग भागवत से, भौतिक जगत में तथा दिव्य जगत में भगवान् के महिमामंडित कार्यकलापों को सुनकर समान लाभ उठा सकते हैं। भौतिकतावादी भौतिक नियमों एवं उनकी कार्यविधि में अधिक रुचि रखते हैं, वे भौतिक चकाचौंध में आश्चर्य देखते हैं। कभी-कभी इसी चकाचौंध में वे भगवान् की महिमा को भूल जाते हैं। उन्हें यह जान लेना चाहिए कि सारे भौतिक कार्यकलाप तथा आश्चर्य भगवान् द्वारा ही प्रेरित हैं। उद्यान में गुलाब का फूल धीरे-धीरे विकसित होकर रूप-रंग ग्रहण करके सुन्दर तथा सुरभित बनता है, वह किसी अन्धाधुंध भौतिक नियम के अधीन होकर ऐसा नहीं करता, यद्यपि प्रतीत ऐसा ही होता है। इस भौतिक नियम के पीछे परमेश्वर की पूर्ण चेतना का निर्देशन होता है, अन्यथा वस्तुएँ इतना नियमित रूप धारण नहीं कर सकतीं। कलाकार सम्पूर्ण मनोयोग और कलात्मक अनुभूति से गुलाब का चित्र बनाता है, किन्तु तो भी वह असली गुलाब की तरह पूर्ण नहीं होता। यदि यह सत्य है, तो हम यह किस तरह कह सकते हैं कि असली गुलाब ने बिना बुद्धि के ऐसा सुन्दर रूप प्राप्त किया? अल्पज्ञता के कारण ही इस निष्कर्ष पर पहुँचा जाता है। सृष्टि तथा संहार के उपर्युक्त वर्णन से हमें यह समझना चाहिए कि सर्वव्यापी होने से परम चेतना प्रत्येक वस्तु का पूरा ध्यान रखती है। परमेश्वर की सर्वव्यापकता का तथ्य यही है। निपट भौतिकतावादियों से भी बढक़र मूर्ख व्यक्ति अपने को गुणातीतवादी (अध्यात्मवादी) कहते हैं और अपने मेंं सर्वव्यापी चेतना पाये जाने का दावा तो करते हैं, किन्तु कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं करते। ऐसे मूर्ख व्यक्तियों को यह भी पता नहीं चल पाता कि दीवाल के उस ओर क्या हो रहा है। फिर भी वे परम पुरुष की सर्वव्यापी चेतना से अपने को समन्वित होने का झूठा गर्व करते हैं। ऐसे लोगों के लिए भी श्रीमद्भागवत का सुनना सहायक बनता है। इससे उनकी आँखें खुल जाएँगी और उन्हें पता चलेगा कि परम चेतना का दावा करने से ही कोई परम भावना से भावित नहीं हो जाता। इस भौतिक संसार में उन्हें प्रमाण देना होता है कि उन्हें ऐसी परम चेतना प्राप्त है। किन्तु नैमिषारण्य के ऋषि कोरे भौतिकतावादियों तथा झूठे अध्यात्मवादियों से ऊपर थे, अत: वे अधिकारी व्यक्तियों से दिव्य विषयों की वास्तविक सत्यता जानने के लिए सदैव इच्छुक थे।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥