श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 10: भागवत सभी प्रश्नों का उत्तर है  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक
योऽध्यात्मिकोऽयं पुरुष: सोऽसावेवाधिदैविक: ।
यस्तत्रोभयविच्छेद: पुरुषो ह्याधिभौतिक: ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो; अध्यात्मिक:—इन्द्रियों से युक्त; अयम्—यह; पुरुष:—व्यक्ति; स:—वह; असौ—वह; एव—भी; अधिदैविक:— नियामक देव; य:—जो; तत्र—वहाँ; उभय—दोनों का; विच्छेद:—वियोग; पुरुष:—व्यक्ति; हि—क्योंकि; आधिभौतिक:— दृश्य शरीर अथवा देहवान जीवात्मा ।.
 
अनुवाद
 
 विभिन्न इन्द्रियों से युक्त व्यक्ति आध्यात्मिक पुरुष कहलाता है और इन इन्द्रियों को वश में रखने वाला देव (श्रीविग्रह) अधिदैविक कहलाता है। नेत्रगोलकों में दिखने वाला स्वरूप अधिभौतिक पुरुष कहलाता है।
 
तात्पर्य
 परम नियन्ता आश्रय तत्त्व परमात्मा के अपने रुप (स्वांश रुप) भगवान् हैं। भगवद्गीता (१०.४२) में कहा गया है—

अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन।

विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥

विष्णु, ब्रह्मा तथा शिव जैसे सभी नियामक देव पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण के परमात्मा रूप के विविध प्राकट्य हैं, जो उनके ही द्वारा उत्पन्न प्रत्येक ब्रह्माण्ड में प्रविष्ट होकर अपने को इसी प्रकार प्रकट करते हैं। फिर भी नियन्त्रक तथा नियन्त्रित के भी विभाग हैं। उदहारणार्थ, खाद्य विभाग का नियन्त्रक व्यक्ति उन्हीं अवयवों से निर्मित होता है जिनसे नियन्त्रित व्यक्ति। इसी प्रकार भौतिक जगत का प्रत्येक प्राणी उच्च देवताओं द्वारा नियन्त्रित होता है। उदाहरणार्थ, हमारी इन्द्रियों के नियन्त्रक वरिष्ठ नियामक देवता हैं। हम प्रकाश के बिना देख नहीं सकते, किन्तु प्रकाश का परम नियामक सूर्य है। सूर्यदेव सूर्यलोक में रहते हैं और जहाँ तक हमारी आँखों की बात है मनुष्य अथवा अन्य जीव इस पृथ्वी पर होने के कारण सूर्यदेव द्वारा नियन्त्रित होते हैं। इसी प्रकार हमारी समस्त इन्द्रियाँ वरिष्ठ देवताओं द्वारा नियन्त्रित हैं, जो हमारी ही तरह की नियन्त्रित जीवात्माएँ हैं, किन्तु ये शक्तिसम्पन्न हैं और हम उनके द्वारा नियन्त्रित हैं। नियन्त्रित (शासित) जीवात्मा अध्यात्मिक पुरुष कहलाता है और नियन्त्रक अधिदैविक पुरुष कहलाता है। संसार के ये सारे पद विभिन्न कर्मों के फलस्वरूप हैं। कोई भी जीव अपने पुण्यकर्म के द्वारा सूर्यदेव, यहाँ तक कि ब्रह्मा अथवा उच्च लोकों का कोई अन्य देवता, बन सकता है। इसी प्रकार निम्न श्रेणी के सकाम कार्यों के कारण वह उच्चतर देवताओं द्वारा नियन्त्रित होता है। इस प्रकार प्रत्येक जीवात्मा परमात्मा के परम नियन्त्रण में रहता है, जो प्रत्येक व्यक्ति को नियन्त्रक तथा नियन्त्रित के विभिन्न पदों पर आसीन करते हैं।

जो नियन्त्रक तथा नियन्त्रित में भेद का कारण है अर्थात् भौतिक देह, वह अधिभौतिक पुरुष कहलाता है। शरीर को कभी-कभी पुरुष कहा जाता है, जिसकी पुष्टि वेदों के इस सूत्र में हुई है—स वा एष पुरुषोऽन्नरसमय:। यह शरीर अन्न-रस रूप है। यह शरीर अन्न पर निर्भर है, किन्तु शरीर में रहने वाला जीवात्मा कुछ खाता नहीं, क्योंकि मूलत: स्वामी आत्मा है। भौतिक शरीर के क्षय होने के पश्चात् उसके बदलने की आवश्यकता होती है। अत: एक जीवात्मा तथा नियन्त्रक देव का अन्तर अन्न-रस- मय देह में है। सूर्य का शरीर विराट हो सकता है और मनुष्य का लघु, किन्तु सभी दृश्य देह पदार्थ से निर्मित हैं, तो भी सूर्य तथा पुरुष, जो नियन्त्रक तथा नियन्त्रित सम्बन्ध से बँधे हैं, परमेश्वर के एक-से अध्यात्मिक अंश हैं और इन अंशों को विभिन्न पदों में बैठाने वाला परमेश्वर ही है। इस तरह यह निष्कर्ष निकला कि परम पुरुष सभी का आश्रय है।

 
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