श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 2: हृदय में भगवान्  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक
उन्निद्रहृत्पङ्कजकर्णिकालये
योगेश्वरास्थापितपादपल्लवम् ।
श्रीलक्षणं कौस्तुभरत्नकन्धर-
मम्‍लानलक्ष्म्या वनमालयाचितम् ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
उन्निद्र—खिले हुए; हृत्—हृदय; पङ्कज—कमल का फूल; कर्णिका-आलये—पुष्पगुच्छ की सतह पर; योग-ईश्वर—महान् योगी; आस्थापित—रखा हुआ; पाद-पल्लवम्—चरणकमल; श्री—लक्ष्मी या सुन्दर बछड़ा; लक्षणम्—इस प्रकार के चिह्न से युक्त; कौस्तुभ—कौस्तुभि मणि; रत्न—अन्य रत्न; कन्धरम्—कन्धे पर; अम्लान—ताजा; लक्ष्म्या—सौन्दर्य; वन-मालया— पुष्पहार से; आचितम्—फैला हुआ ।.
 
अनुवाद
 
 उनके चरण-कमल महान् योगियों के कमल-सदृश हृदयों के गुच्छों के ऊपर रखे हैं। उनके वक्षस्थल पर कौस्तुभ मणि है, जिसमें सुन्दर बछड़ा अंकित है और उनके कंधों पर अनेक रत्न हैं। उनका पूर्ण स्कंध-प्रदेश ताजे फूलों की माला से सज्जित है।
 
तात्पर्य
 भगवान् के दिव्य शरीर के आभूषण पुष्प, वस्त्र तथा अन्य सारे अलंकरण भगवान् के शरीर से अभिन्न हैं। इनमें से कुछ भी भौतिक अवयवों से नहीं बना है, अन्यथा वह भगवान् के शरीर को अलंकृत नहीं कर सकता था। इसी तरह परव्योम में आध्यात्मिक किस्मों को भौतिक विविधता से पृथक् किया जाता है।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥