श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 2: हृदय में भगवान्  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक
विभूषितं मेखलयाङ्गुलीयकै-
र्महाधनैर्नूपुरकङ्कणादिभि: ।
स्निग्धामलाकुञ्चितनीलकुन्तलै-
र्विरोचमानाननहासपेशलम् ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
विभूषितम्—सुसज्जित; मेखलया—करधनी से; अङ्गुलीयकै:—अँगूठियों से; महा-धनै:—अत्यन्त मूल्यवान; नूपुर—पायल; कङ्कण-आदिभि:—कंकण आदि से; स्निग्ध—चिकना; अमल—निष्कलंक; आकुञ्चित—घुँघराले; नील—नीले रंग के; कुन्तलै:—बालों से; विरोचमान—अत्यन्त सुहावना; आनन—मुख; हास—मुस्कान; पेशलम्—सुन्दर ।.
 
अनुवाद
 
 उनकी कमर अलंकृत करधनी से सुशोभित है और उनकी अंगुलियों में बहुमूल्य रत्नों से जटित अँगूठियाँ हैं। उनके नूपुर, उनके कंकण, उनके घुँघराले नीले रंग के चिकने बाल तथा उनका सुन्दर मुस्कान-युक्त मुख—ये सभी अत्यन्त लुभावने हैं।
 
तात्पर्य
 भगवान् सर्वाधिक सुन्दर पुरुष हैं। श्रील शुकदेव गोस्वामी उनके अंग-प्रत्यंग के दिव्य सौन्दर्य का वर्णन निर्विशेषवादियों को यह पाठ पढ़ाने के लिए करते हैं कि भगवान् पूजा की सुविधा के लिए भक्त की कोरी कल्पना नहीं हैं, अपितु यथार्थ में और स्वरुप से परम पुरुष हैं। परम सत्य का निराकार स्वरूप उनका विकिरण मात्र है, जिस तरह सूर्य की किरणें सूर्य के विकिरण हैं।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥