श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 2: हृदय में भगवान्  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक
अदीनलीलाहसितेक्षणोल्लसद्-
भ्रूभङ्गसंसूचितभूर्यनुग्रहम् ।
ईक्षेत चिन्तामयमेनमीश्वरं
यावन्मनो धारणयावतिष्ठते ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
अदीन—अत्यन्त उदार, दैन्यरहित; लीला—लीलाएँ; हसित—हास; ईक्षण—चितवन से; उल्लसत्—चमकता; भ्रू-भङ्ग—भौहों का बाँकपन; संसूचित—सूचित; भूरि—विशाल; अनुग्रहम्—वर, कृपा; ईक्षेत—एकाग्र करे; चिन्तामयम्—दिव्य; एनम्—इस विशेष; ईश्वरम्—परमेश्वर को; यावत्—जब तक; मन:—मन; धारणया—ध्यान से; अवतिष्ठते—स्थिर किया जा सकता है ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् की भव्य लीलाएँ तथा उनके हास्यमय मुख की उल्लासमयी चितवन उनके व्यापक वरदानों के संकेत हैं। अतएव मनुष्य को चाहिए कि जब तक ध्यान द्वारा उसका मन भगवान् पर स्थिर रखा जा सके, तब तक मन को उनके इसी दिव्य रूप में एकाग्र करे।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (१२.५) में कहा गया है कि निर्विशेषवादी अपने निराकार ध्यान के कारण अनेक कठिनाइयों से गुजरता है। लेकिन भगवान् की साकार सेवा के कारण भक्त सरलता से प्रगति करता रहता है। अतएव निराकार ध्यान निर्विशेषवादी के लिए कष्ट का कारण है। यहाँ पर भक्त को निर्विशेषवादी चिन्तक की तुलना में एक लाभ है। निर्विशेषवादी भगवान् के साकार रूप के विषय में संशय-युक्त रहता है, अतएव वह सदैव ऐसी वस्तु का ध्यान करने का प्रयास करता है, जो साकार नहीं है। इसी कारण से भागवत में भगवान् के यथार्थ स्वरूप पर ध्यान एकाग्र करने के लिए, प्रामाणिक वक्तव्य दिया गया है।

यहाँ पर ध्यान की जिस विधि का अनुमोदन किया गया है, वह भक्तियोग अर्थात् भौतिक अवस्थाओं से मुक्त होने के बाद की भक्ति विधि है। ज्ञानयोग भौतिक अवस्थाओं से मुक्ति की विधि है। संसार की अवस्थाओं से मुक्त हो लेने के बाद अर्थात् निवृत्त होने पर, जैसाकि पहले कहा जा चुका है या जब कोई समस्त भौतिक आवश्यकताओं से मुक्त हो जाता है, तो वह भक्तियोग विधि को सम्पन्न करने के योग्य बन जाता है। अतएव भक्तियोग में ज्ञानयोग निहित है, अथवा दूसरे शब्दों में शुद्धभक्ति की विधि एकसाथ ज्ञानयोग का भी काम करती है; शुद्ध भक्ति के क्रमिक विकास से भौतिक दशाओं से स्वत: मुक्ति प्राप्त हो जाती है। भक्तियोग के ये प्रभाव अनर्थ-निवृत्ति कहलाते हैं। भक्तियोग की प्रगति के साथ-साथ कृत्रिम रूप से अर्जित की गई वस्तुएँ क्रमश: लुप्त होती जाती हैं। भगवान् के चरणकमलों का ध्यान, जो प्रथम सोपान के रूप में है, अनर्थ-निवृत्ति के द्वारा अपना प्रभाव दिखायेगा। अनर्थ का सबसे स्थूल प्रकार, जो बद्धजीव को जगत से बाँधता है, वह कामवासना है और यह कामवासना धीरे-धीरे विकसित होकर नर तथा नारी का मेल कराती है। नर-नारी का मिलाप हो जाने पर घर, बच्चे, मित्र, सम्बन्धी तथा सम्पत्ति के जुट जाने से कामवासना और अधिक बढ़ती है। जब इन सबकी प्राप्ति हो जाती है, तो बद्धजीव इन सारे बन्धनों से अभिभूत हो उठता है और मिथ्या अंहकार भाव, या “मैं” और “मेरा” का भाव प्रधान बन जाता है और कामवासना विविध राजनीतिक, सामाजिक, परोपकारी तथा अन्य अवांछित कार्यकलापों में विस्तारित हो जाती है मानो समुद्री लहरों पर तैरता फेन हो जो कभी तो स्पष्ट दिखता है, किन्तु दूसरे ही क्षण उसी तरह लुप्त हो जाता है, जिस प्रकार आकाश से बादल लुप्त हो जाते हैं। बद्धजीव ऐसी वस्तुओं से तथा कामवासना की वस्तुओं से घिरा रहता है, किन्तु भक्तियोग से कामवासना धीरे-धीरे छूमन्तर हो जाती है, जिसका सारांश लाभ, पूजन तथा ख्याति इन तीन शीर्षकों से दिया गया है। सारे बद्धजीव कामवासना के इन विविध रूपों के पीछे पागल बने रहते हैं और मनुष्य यह स्वयं देख सकता है कि कामवासना पर आधारित ऐसी भौतिक लालसाओं से वह किस हद तक मुक्त हुआ है। जिस प्रकार भोजन के हर कौर खाने से मनुष्य की भूख बुझती जाती है, उसी तरह उसे पता चल सकेगा कि वह कामवासना से किस हद तक मुक्त हुआ है। भक्तियोग की प्रक्रिया से यह कामवासना अपने विविध रूपों सहित घटती जाती है, क्योंकि भक्तियोग से भगवत्कृपा से स्वत: ज्ञान तथा वैराग्य उत्पन्न होता है, भले ही भक्त भौतिक दृष्टि से ठीक से शिक्षित न हो। ज्ञान का अर्थ है वस्तुओं को उनके उसी रूप में जानना और यदि विचार-विमर्श से यह ज्ञात हो जाय कि कुछ वस्तुएँ ऐसी हैं, जो सर्वथा अनावश्यक हैं, तो यह स्वाभाविक है कि जिसने ज्ञान अर्जित किया है, वह ऐसी अवांछित वस्तुओं को छोड़ देगा। जब बद्धजीव ज्ञान के अनुशीलन द्वारा यह देखता है कि भौतिक आवश्यकताएँ अवांछित हैं, तो वह उनसे अपना नाता तोड़ लेता है। ज्ञान की यह अवस्था वैराग्य अर्थात् अवांछित वस्तुओं से विरक्ति कहलाती है। हम इससे पूर्व बता चुके हैं कि अध्यात्मवादी को स्वावलम्बी होना चाहिए और उसे अपने जीवन की नैत्यिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए धनी अन्धे पुरुषों से भीख नहीं माँगनी चाहिए। शुकदेव गोस्वामी ने जीवन की ऐसी आवश्यकताओं यथा खाने, सोने तथा रहने की समस्याओं के लिए विकल्प सुझाये हैं, लेकिन उन्होंने कामवासना की तुष्टि के लिए कोई विकल्प नहीं सुझाया। जिसके अन्त:करण में कामवासना तब भी आन्दोलित हो रही हो, उसे संन्यास आश्रम नहीं ग्रहण करना चाहिए। जिसने यह अवस्था नहीं प्राप्त की है, उसके लिए संन्यास आश्रम ग्रहण करने का प्रश्न ही नहीं उठता। इस प्रकार सही गुरु के मार्गदर्शन में क्रमिक भक्तियोग द्वारा तथा भागवत के सिद्धान्तों के अनुसरण द्वारा मनुष्य संन्यास आश्रम ग्रहण करने के पूर्व कम से कम स्थूल काम-वासना को तो वश में कर सकेगा।

इस तरह शुद्धि (परिष्कार) का अर्थ है क्रमश: कामवासना से मुक्त होना और इसकी प्राप्ति यहाँ पर वर्णित विधि द्वारा—भगवान् के चरणों से प्रारम्भ करके उनके ध्यान द्वारा—की जा सकती है। मनुष्य को चाहिए कि पहले वह स्वयं यह देख ले कि कामवासना से वह कितना मुक्त हुआ है, तभी ऊपर उठने (भगवान् के ऊपरी अंगों पर ध्यान) का प्रयत्न करे। श्रीमद्भागवत का दशम स्कन्ध भगवान् का हास्यमय मुखमंडल है। ऐसे अनेक नवसिखिये हैं, जो तुरन्त ही दशम स्कन्ध से अध्ययन प्रारम्भ करने लगते हैं और उसमें भी विशेष रूप से वे पाँच अध्याय जिनमें भगवान् की रासलीला का वर्णन है। यह निश्चय ही अनुचित है। भागवत के ऐसे अनुचित अध्ययन या श्रवण से भौतिक अवसरवादियों ने भागवत के नाम पर विषयी जीवन में लिप्त होकर ऊधम मचा रखा है। भागवत को इस तरह लांछित करने का कार्य तथाकथित भक्तों के कार्यों से सम्पन्न हुआ है। इसके पूर्व कि कोई भागवत-वाचन का प्रदर्शन करे, उसे समस्त प्रकार की कामवासनाओं से मुक्त होना चाहिए। श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने शुद्धि का अर्थ कामविषयों में निर्लिप्त होना बताया है। वे कहते हैं—यथा यथा धीश्च शुध्यति विषयलाम्पट्यं त्यजति, तथा तथा धारयेदिति चित्तशुद्धितारतम्येनैव ध्यानतारतम्यमुक्तम् और ज्योंही कोई बुद्धि के परिष्कार से कामलिप्सा के नशे से मुक्त हो जाता है तब उसे आगे बढक़र ध्यान करना चाहिए। अर्थात् दूसरे शब्दों में, भगवान् के दिव्य शरीर के विभिन्न अंगों के ध्यान को हृदय की शुद्धि के अनुपात से बढ़ाना चाहिए। निष्कर्ष यह निकला कि जो लोग अब भी कामवासना में अनुरक्त होकर फँसे हुए हैं, उन्हें कभी भगवान् के चरणों के ऊपर के अंगों पर ध्यान नहीं करना चाहिए, अतएव उन्हें अपने आपको श्रीमद्भागवत के प्रथम दो स्कन्धों का ही पाठ करने तक सीमित कर लेना चाहिए। मनुष्य को पहले प्रथम नौ स्कन्धों की विषयवस्तु को आत्मसात् करके शुद्धि की प्रक्रिया पूरी करनी चाहिए। तब उसे श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध में प्रवेश की अनुमति दी जानी चाहिए।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥