श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 2: हृदय में भगवान्  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक
एकैकशोऽङ्गानि धियानुभावयेत्
पादादि यावद्धसितं गदाभृत: ।
जितं जितं स्थानमपोह्य धारयेत्
परं परं शुद्ध्यति धीर्यथा यथा ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
एक-एकश:—एक-एक करके, या एक के पश्चात् दूसरा; अङ्गानि—अंगों को; धिया—ध्यान से; अनुभावयेत्—ध्यान करे; पाद-आदि—पाँव इत्यादि; यावत्—जब तक; हसितम्—मुसकान; गदा-भृत:—भगवान्; जितम् जितम्—धीरे-धीरे मन को नियन्त्रित करते हुए; स्थानम्—स्थान को; अपोह्य—छोड़ कर; धारयेत्—ध्यान करे; परम् परम्—उच्च से उच्चतर; शुद्ध्यति— शुद्ध होती है; धी:—बुद्धि; यथा यथा—जितनी ।.
 
अनुवाद
 
 ध्यान की प्रक्रिया भगवान् के चरण-कमलों से प्रारंभ करते हुए उसे उनके हँसते मुखमंडल तक ले आये। इस तरह पहले ध्यान को चरण-कमलों पर एकाग्र करे, फिर पिंडलियों पर, तब जाँघों पर और क्रमश : ऊपर की ओर उठता जाये। मन जितना ही एक-एक करके भगवान् के विभिन्न अंगों पर स्थिर होगा, बुद्धि उतनी ही अधिक परिष्कृत होगी।
 
तात्पर्य
 श्रीमद्भागवत में ध्यान की जिस विधि की संस्तुति की गई है, वह किसी विशेष वस्तु या शून्य पर मन को स्थिर करने की नहीं है। ध्यान को तो भगवान् पर एकाग्र करना चाहिए, चाहे वह उनका विराट-रूप अर्थात् विराट विश्व-रुप हो या शास्त्रों में वर्णित उनका सच्चिदानन्द विग्रह रूप। विष्णु रूपों के प्रामाणिक विवरण प्राप्त हैं और मन्दिरों में अर्चा-विग्रह के प्रामाणिक प्रतिरूप हैं। इस प्रकार मनुष्य अर्चा-विग्रह का ध्यान करना प्रारम्भ कर सकता है, जिसमें उसे अपने मन को भगवान् के चरणकमलों पर एकाग्र करते हुए क्रमश: ऊपर-ऊपर उठते हुए उनके मुसकाते मुख तक आना चाहिए।

भागवत-विचारधारा के अनुसार भगवान् का रासनृत्य भगवान् का मुसकाता मुखमंडल है। चूँकि इस श्लोक में संस्तुति की गई है कि मनुष्य भगवान् के चरणकमलों का ध्यान करता हुआ, मुसकाते मुखमंडल तक क्रमश: ऊपर उठे, अतएव हमें चाहिए कि रासनृत्य में भगवान् की लीलाएँ समझने के लिए हम छलाँग न लगायें। श्रेयस्कर यही होगा कि हम भगवान् के चरणकमलों पर पुष्प तथा तुलसी दल अर्पित करके अपने ध्यान को एकाग्र करने का अभ्यास करें। इस प्रकार धीरे-धीरे हम अर्चना विधि से शुद्ध हो जाते हैं। हम भगवान् को वस्त्र पहनाते हैं, उन्हें नहलाते हैं, इत्यादि-इत्यादि, जो सारे के सारे दिव्य कार्यकलाप होते हैं। ये हमें जीवन को शुद्ध बनाने में सहायक होते हैं। जब हम शुद्धि के उच्चतर स्तर तक पहुँच जाते हैं और यदि हम भगवान् का मुसकाता मुखमंडल देखते हैं या भगवान् की रासलीला का श्रवण करते हैं, तो हम उनके कार्यकलापों का रसास्वाद कर सकते हैं। इसीलिए श्रीमद्भागवत में रासलीला को दशम स्कन्ध में उद्धृत किया गया है (अध्याय २९-३४)। मनुष्य भगवान् के दिव्य रूप पर चित्त को जितना ही एकाग्र करता है, चाहे वह चरणकमलों पर हो या पिंडलियों या जंघाओं अथवा वक्ष-स्थल पर, वह उतना ही शुद्ध होता जाता है। इस श्लोक में स्पष्ट कहा गया है कि, “बुद्धि उतनी ही अधिक परिष्कृत होगी” जिसका अर्थ है कि मनुष्य इन्द्रियतृप्ति से जितना ही विरक्त होता जाता है बुद्धि उतनी ही अधिक परिष्कृत होगी। वर्तमान बद्ध अवस्था में हमारी बुद्धि अशुद्ध है, क्योंकि वह इन्द्रियतृप्ति में व्यस्त लगी हुई रहती है। भगवान् के दिव्य रूप का ध्यान करने का फल मनुष्य की इन्द्रियतृप्ति से विरक्ति द्वारा प्रकट होगा, अतएव ध्यान का चरम उद्देश्य अपनी बुद्धि की शुद्धि (परिष्कार) है।

वे लोग, जो इन्द्रियतृप्ति में अत्यधिक लोग रहते हैं, उन्हें अर्चना में सम्मिलित होने या राधा-कृष्ण के दिव्य स्वरूप या विष्णु अर्चा-विग्रहों का स्पर्श करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। उनके लिए यह श्रेयस्कर होगा कि वे भगवान् के विराट-रूप का ध्यान धरें, जैसाकि अगले श्लोक में कहा गया है। अतएव निर्विशेषवादियों तथा शून्यवादियों को सलाह दी जाती है कि वे भगवान् के विराट-रूप का ध्यान धरें, किन्तु भक्तों को मन्दिर में अर्चा-विग्रह का ध्यान करने की संस्तुति की जाती है। चूँकि निर्विशेषवादी तथा शून्यवादी अपने आध्यात्मिक कार्य-कलापों में पर्याप्त शुद्ध नहीं होते, अतएव अर्चना की विधि उनके निमित्त नहीं है।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥