श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 2: हृदय में भगवान्  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक
यावन्न जायेत परावरेऽस्मिन्
विश्वेश्वरे द्रष्टरि भक्तियोग: ।
तावत् स्थवीय: पुरुषस्य रूपं
क्रियावसाने प्रयत: स्मरेत ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
यावत्—जब तक; न—नहीं; जायेत—विकसित होता है; पर—दिव्य; अवरे—संसारी; अस्मिन्—इस रूप में; विश्व-ईश्वरे— समस्त जगतों के स्वामी; द्रष्टरि—देखनेवाले को; भक्ति-योग:—भक्तिमयी सेवा, भक्ति; तावत्—तब तक; स्थवीय:—स्थूल भौतिकतावादी; पुरुषस्य—विराट पुरुष का; रूपम्—विश्वरूप; क्रिया-अवसाने—अपने कर्तव्यों के पूरा होने पर; प्रयत:— सावधानीपूर्वक; स्मरेत—स्मरण करे ।.
 
अनुवाद
 
 जब तक स्थूल भौतिकतावादी व्यक्ति दिव्य तथा भौतिक दोनों ही जगतों के द्रष्टा परमेश्वर की प्रेमाभक्ति विकसित न कर ले, तब तक उसे अपने कर्तव्यों को पूरा कर लेने के बाद भगवान् के विराट रूप का स्मरण या ध्यान करना चाहिए।
 
तात्पर्य
 परमेश्वर सभी जगतों के द्रष्टा हैं, चाहे भौतिक जगत हो या आध्यात्मिक। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर सभी जगतों के परम भोक्ता हैं, जैसाकि भगवद्गीता (५.२९) में पुष्टि हुई है। आध्यात्मिक जगत उनकी अन्तरंगा शक्ति का प्राकट्य है, जबकि भौतिक जगत उनकी बहिरंगा शक्ति का। सारे जीव भी उनकी तटस्था शक्ति हैं और वे अपनी रुचि के अनुसार भौतिक जगत या आध्यात्मिक जगत में रह सकते हैं। यह भौतिक जगत जीवात्माओं के लिए उपयुक्त वासस्थान नहीं है, क्योंकि सारे जीव आध्यात्मिक दृष्टि से भगवान् से अभिन्न हैं, किन्तु भौतिक जगत में सारे जीव भौतिक जगत के नियमों के द्वारा बद्ध हो जाते हैं। चूँकि सारे जीव उनके अंश-रूप हैं, अत: भगवान् चाहते हैं कि वे सभी उनके साथ आध्यात्मिक जगत में रहें। भौतिक जगत में जीवों को प्रबुद्ध करने के लिए सारे वेद तथा शास्त्र उपलब्ध हैं जिनके द्वारा उन्हें विशेष रूप से भगवद्धाम वापस बुलाया जा सकता है। दुर्भाग्यवश, जीव बद्धजीवन के तीन प्रकार के कष्टों को सहता हुआ भी भगवद्धाम जाने के प्रति बहुत गंभीर नहीं रहता। यह उसकी पथभ्रष्ट जीवन-शैली के कारण है, जो पापों तथा पुण्यों के कारण जटिल बन गई है। जीवों में से कुछ जीव, जो पुण्य कर्म करते हैं, भगवान् के साथ अपने भूले हुए सम्बन्ध को पुन:स्थापित करना आरम्भ करते हैं, किन्तु वे भगवान् के साकार रूप को नहीं समझ पाते। जीवन का असली उद्देश्य भगवान् के साथ सम्पर्क स्थापित करना और उनकी सेवा में लग जाना है। यही जीवों की स्वाभाविक स्थिति है। किन्तु जो निर्विशेषवादी हैं और भगवान् की प्रेमाभक्ति कर पाने में असमर्थ रहते हैं, उन्हें भगवान् के निराकार रूप या विराट-रूप का ध्यान करने की सलाह दी गई है। यदि मनुष्य तनिक भी चाहता है कि जीवन का वास्तविक सुख प्राप्त हो तथा उसे बंधनहीन सहज अवस्था प्राप्त हो, तो उसे चाहिए कि जिस तरह से भी हो सके भगवान् के साथ अपने विस्मृत सम्बन्धों को पुन:स्थापित करने का प्रयत्न करे। कम बुद्धिमान नौसिखियों द्वारा निर्विशेष स्वरूप या विराट स्वरूप का ध्यान क्रमश: उन्हें साकार स्वरूप के सम्पर्क में आने के योग्य बना देगा। यहाँ पर मनुष्य को पिछले अध्यायों में वर्णित विराट-रूप का ध्यान करने की सलाह दी गई है, जिससे वह समझ सके कि किस तरह विभिन्न लोक, समुद्र, पर्वत, नदियाँ, पक्षी, पशु, मनुष्य, देवता तथा अन्य जो कुछ सोचा जा सकता है, भगवान् के विराट रूप के ही अंग-प्रत्यंग हैं। इस प्रकार का चिन्तन भी एक प्रकार से परम सत्य का ध्यान ही है। ज्योंही ऐसा ध्यान प्रारम्भ हो जाता है, मनुष्य में दैवी गुण आ जाते हैं और सारा संसार समस्त लोगों के लिए एक सुखमय तथा शान्तिमय आवास लगने लगता है। ईश्वर के ऐसे निराकार या साकार रूप के ध्यान के बिना मनुष्य के सारे सद्गुण उसकी अपनी स्वाभाविक स्थिति के विषय में भ्रान्तियों से ढके रहते हैं और ऐसे उच्च ज्ञान के बिना सारा संसार मनुष्य के लिए नरक बन जाता है।
 
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